कुरूद ने लिखा इतिहास: छत्तीसगढ़ राज्य बनने से चार साल पहले ही स्थापित हुआ था ‘छत्तीसगढ़ महतारी मंदिर’
- moolchand sinha

- Nov 1, 2025
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कुरूद, 1 नवंबर 2025।
छत्तीसगढ़ दिवस के अवसर पर जब प्रदेश अपनी स्थापना की 25वीं वर्षगांठ मना रहा है, कुरूद का 'छत्तीसगढ़ महतारी मंदिर' फिर सुर्खियों में है। राज्य का आधिकारिक गठन भले 1 नवंबर 2000 को हुआ, लेकिन कुरूद ने इससे चार वर्ष पहले ही सांस्कृतिक रूप से छत्तीसगढ़ की पहचान को मूर्त रूप दे दिया था। 1995-96 में निर्मित यह मंदिर छत्तीसगढ़िया अस्मिता का पहला संस्थागत प्रतीक माना जाता है। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ राज्य का सपना पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी की पहल से साकार हुआ।
कुरूद का ‘छत्तीसगढ़ महतारी मंदिर’ प्रदेश में अपनी तरह का पहला धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल है, जहाँ माता को धान की बालियाँ, हसिया और पारंपरिक आभूषणों के रूप में छत्तीसगढ़ की मातृशक्ति और कृषि संस्कृति के प्रतीक स्वरूप स्थापित किया गया है।

मंदिर निर्माण का शुभारंभ 5 फरवरी 1995 को हुआ और 20 मार्च 1996 को प्राण-प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई। मंदिर निर्माण की प्रेरणा संत पवन दीवान से मिली, जबकि निर्माणकर्ता गुरुमुख सिंह होरा रहे। मंदिर की प्रतिमा जयपुर से, कलश उड़ीसा से और मुख्य द्वार जगदलपुर से मंगवाया गया।
मंदिर परिसर में लगे शिलापट्ट पर समय और निर्माण विवरण आज भी सुरक्षित हैं, जो यह प्रमाणित करते हैं कि कुरूद ने राज्य गठन से पूर्व ही सांस्कृतिक रूप से छत्तीसगढ़ की पहचान को स्थापित किया था।
विशेष परंपरा
इस मंदिर में हर वर्ष नई फसल आने पर माता का श्रृंगार धान की बालियों से किया जाता है। यह परंपरा छत्तीसगढ़ की कृषि-आधारित संस्कृति और मातृभूमि के प्रति श्रृद्धा का प्रतीक मानी जाती है।
मंदिर परिसर में लगने वाला ऐतिहासिक भव्य मड़ई मेला हजारों श्रद्धालुओं और सांस्कृतिक कलाकारों का संगम होता है। यहाँ छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य, गीत-संगीत, कथा-परंपरा और पारंपरिक व्यंजन प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखते हैं।
छत्तीसगढ़ राज्य के अस्तित्व की घोषणा भले वर्ष 2000 में हुई हो, लेकिन कुरूद ने 1995-96 में ही छत्तीसगढ़िया अस्मिता को मंदिर स्वरूप देकर यह संदेश दे दिया था कि यह भूमि अपनी पहचान, संस्कृति और सम्मान को स्वयं स्थापित करने का सामर्थ्य रखती है।




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