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Dhamtari Illegal Mining: श्मशान घाट से कंकाल निकले, तब टूटी प्रशासन की नींद? विभागीय दावों और जमीनी हकीकत में बढ़ा फासला



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धमतरी।

छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले से एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने न सिर्फ मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि प्रशासनिक चौकसी के दावों के परखच्चे उड़ा दिए हैं। खरेंगा के श्मशान घाट क्षेत्र में चल रहे Dhamtari Illegal Mining के खेल का ऐसा खौफनाक अंत देखने को मिला कि अब खुद विभाग को मुंह छुपाने की जगह नहीं मिल रही है।

महानदी की छाती को चीरते हुए रेत माफिया जब श्मशान घाट तक जा पहुंचे और खुदाई के दौरान जमीन से पूर्वजों के मानव कंकाल और अस्थियां बाहर आने लगीं, तब जाकर कुंभकर्णी नींद में सोए प्रशासन की नींद टूटी है।

जब खदान स्वीकृत नहीं थी, तो किसका संरक्षण था?

खरेंगा की इस हृदयविदारक घटना के बाद अब विभागीय कार्रवाई के नाम पर कागजी तीर चलाए जा रहे हैं। प्रशासन ने आनन-फानन में पांच ट्रैक्टर जब्त करने का दावा किया है, खनि निरीक्षक (Mining Inspector) को कारण बताओ नोटिस थमाया गया है और एक संबंधित फर्म की रेत भंडारण स्वीकृति निरस्त कर दी गई है।

लेकिन इस पूरी कार्रवाई के बीच सबसे बड़ा और तीखा सवाल यही उठता है:

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"जब खनिज विभाग खुद आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर रहा है कि खरेंगा में कोई रेत खदान स्वीकृत ही नहीं है, तो महीनों से वहां दिन-रात Dhamtari Illegal Mining का यह काला कारोबार किसके वरदहस्त और संरक्षण में फल-फूल रहा था?"

प्रशासनिक विज्ञप्ति कहती है कि 28 मई को शिकायत मिलने पर खनिज, राजस्व और पुलिस की संयुक्त टीम मौके पर पहुंची। लेकिन स्थानीय ग्रामीण इस दावे पर हंस रहे हैं। ग्रामीणों का साफ कहना है कि यह कोई एक दिन या एक रात की चोरी नहीं है। महानदी के इस संवेदनशील हिस्से में महीनों से ट्रैक्टरों का काफिला दौड़ रहा था, चीखती हुई मशीनें चल रही थीं। ग्रामीणों ने कई बार विरोध की आवाज बुलंद की, लेकिन प्रशासन तब बहरा बना रहा।

Dhamtari Illegal Mining: आस्था पर चोट, पहले कहां था निगरानी तंत्र?

यह मामला किसी सामान्य नदी के किनारे का नहीं है, बल्कि उस श्मशान घाट का है जिसे समाज में सबसे पवित्र और शांत स्थान माना जाता है। जहां वर्षों से ग्रामीणों ने अपने परिजनों को अश्रुपूरित आंखों से अंतिम विदाई दी, वहां माफियाओं की जेसीबियां चल रही थीं।

कागजी दावों की खुली पोल:

अभी कुछ दिनों पहले ही खनिज विभाग ने एक प्रेस नोट जारी कर अपनी पीठ थपथपाई थी। दावा किया गया था कि जिले में 'खान एवं खनिज अधिनियम 1957' और 'छत्तीसगढ़ गौण खनिज नियम 2015' के तहत अवैध उत्खनन पर लगातार सख्त कार्रवाई हो रही है।

उड़नदस्ते की 'रहस्यमयी' खामोशी: अब जनता पूछ रही है कि अगर विभागीय उड़नदस्ता और निरीक्षण दल इतने ही सक्रिय थे, तो श्मशान घाट की जमीन खुदने तक उन्हें कुछ क्यों नहीं दिखा? क्या विभाग को अवैध खनन रोकने के लिए किसी बड़ी अनहोनी या मानव कंकालों के बाहर आने का इंतजार था?

सिर्फ मोहरों पर कार्रवाई, असली 'मगरमच्छों' को कब पकड़ेगा प्रशासन?

ग्रामीणों के अनुसार, क्षेत्र में Dhamtari Illegal Mining को संचालित करने वाले सिंडिकेट का दबदबा इतना है कि विरोध करने वाले स्थानीय लोगों को सीधे धमकियां दी जाती हैं। डर के मारे लोग खुलकर सामने नहीं आते।

ऐसे में पांच ट्रैक्टरों को जब्त कर लेना ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। असली सवाल उन सफेदपोशों और रसूखदारों तक पहुंचने का है, जो इस पूरे नेटवर्क के असली 'मास्टरमाइंड' हैं। खदान स्वीकृत न होने के बावजूद रोज सैकड़ों ट्रिप रेत कहां खपाई जा रही थी? क्या इसकी कोई मुकम्मल जांच होगी या हमेशा की तरह छोटे ट्रैक्टर चालकों को बली का बकरा बनाकर बड़े मगरमच्छों को सेफ एग्जिट दे दिया जाएगा?

अंतिम विदाई के स्थान पर प्रशासनिक लापरवाही का 'कंकाल'

खरेंगा की इस शर्मनाक घटना ने धमतरी जिला प्रशासन की कार्यशैली, खनिज विभाग की जवाबदेही और पर्यावरण संरक्षण के तमाम दावों का 'पोस्टमार्टम' कर दिया है। यह लड़ाई सिर्फ रेत के कुछ डंपरों की नहीं है, यह लड़ाई उस जन-आस्था की है जिसे रेत माफियाओं ने प्रशासनिक ढुलमुल रवैये के चलते सरेआम कुचल दिया। अब देखना यह है कि क्या कलेक्टर की इस कार्रवाई से जिम्मेदार अधिकारियों की वास्तविक जवाबदेही तय होगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन हो जाएगा।

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