Dhamtari News: सिस्टम मृत... संवेदनाएं राख! धमतरी में कंधों पर अर्थी उठा 'अग्निपरीक्षा' दे रहे ग्रामीण, श्मशान का रास्ता बंद
- moolchand sinha

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धमतरी।
कल्पना कीजिए, एक तरफ कलेजा फाड़ देने वाला अपनों को खोने का गम हो, आंखों में आंसू हों, और दूसरी तरफ जब नम आंखों से अंतिम विदाई देने कदम आगे बढ़ें, तो श्मशान जाने का रास्ता ही गायब मिले! सुन कर रूह कांप जाती है, लेकिन धमतरी जिले के वनांचल क्षेत्र का एक पूरा गांव पिछले 4 साल से हर दिन इसी खौफनाक और अमानवीय हकीकत को जी रहा है।
यह झकझोर देने वाली दास्तां धमतरी के नगरी-सिहावा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत खम्हरिया की है। यहाँ विकास की चमचमाती फाइलों के पीछे एक ऐसा स्याह सच छिपा है, जिसने प्रशासनिक संवेदनशीलता को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। गांव में मातम पसरते ही परिजनों की असली परीक्षा शुरू हो जाती है, क्योंकि यहाँ अपनों को मुखाग्नि देने के लिए श्मशान घाट नसीब नहीं हो रहा है।
Dhamtari News : 65 लाख का 'करप्शन' और पानी में बह गई व्यवस्था!

इस पूरे विवाद की जड़ में है गांव और श्मशान घाट को अलग करने वाला तेरगी नाला। दशकों पुराने इस पारंपरिक श्मशान तक पहुंचने का एकमात्र जरिया यहाँ बना एक पुल था, जो सालों पहले भरभरा कर ढह गया।
लापरवाही की खड़ी मीनारें:
ग्रामीण बताते हैं कि साल 2008 के आसपास इस नाले पर करीब 65 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि से पुल का निर्माण कराया गया था। लेकिन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े इस पुल की उम्र चंद साल ही रही। पहली ही बड़ी बाढ़ इस घटिया निर्माण को बहा ले गई। आज नाले के सीने पर खड़े उस पुल के खोखले अवशेष ग्रामीणों को चिढ़ाते हुए प्रशासनिक भ्रष्टाचार की कहानी खुद बयां कर रहे हैं।
खेतों की मेड़ पर रेंगती अर्थियां, उफनते नाले के किनारे चिताएं!
पुल टूटने के बाद से श्मशान तक जाने का कोई पक्का रास्ता नहीं बचा है। किसानों ने हमदर्दी दिखाते हुए अपने खेतों के बीच से संकरी मेड़ का रास्ता तो दिया है, लेकिन वह इतना संकरा है कि वहां से दो लोगों का साथ गुजरना भी दूभर है। ऐसे में कंधों पर भारी अर्थी लेकर उस संकरे रास्ते से संतुलन बनाकर निकलना किसी खतरनाक स्टंट से कम नहीं है।
स्थिति तब और ज्यादा वीभत्स हो जाती है जब बारिश के दिनों में नाला उफान पर होता है। ग्रामीण खेदुराम ध्रुव ने इस दर्द को बयां करते हुए बताया कि मजबूरी में लोगों को नाले के ठीक किनारे या खेतों की बाउंड्री पर अंतिम संस्कार करना पड़ता है। कई बार तो हालात इतने बदतर हो जाते हैं कि जगह की कमी के चलते पुराने शवों के अवशेष तक बाहर आ जाते हैं। यह सिर्फ एक समस्या नहीं, बल्कि आस्था और मानवीय गरिमा का सरेआम चीरहरण है।
सरपंच संतकुमार मरकाम का अल्टीमेटम: 'सुशासन तिहार' के बाद आर-पार की जंग'
इस घोर लापरवाही को लेकर ग्राम पंचायत खम्हरिया के सरपंच संतकुमार मरकाम और आक्रोशित ग्रामीणों का सब्र अब जवाब दे चुका है। सरपंच के मुताबिक, पंचायत स्तर से लेकर जिला प्रशासन और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों के चक्कर काट-काटकर उनके पैर घिस चुके हैं। हर बार चक्का जाम की आहट पाकर अधिकारी 'जल्द समाधान' का झुनझुना थमा देते हैं, लेकिन नतीजा आज भी ढाक के तीन पात है।
20 जून से अनिश्चितकालीन कुरुक्षेत्र:
खोखले आश्वासनों से थक चुके खम्हरिया के ग्रामीणों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। ग्रामीणों ने प्रशासन को दो टूक चेतावनी दी है कि सरकार के 'सुशासन तिहार' के तुरंत बाद, यानी 20 जून से अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन का बिगुल फूंक दिया जाएगा। ग्रामीणों का साफ कहना है कि जब तक श्मशान का रास्ता और नया पुल स्वीकृत नहीं होता, तब तक यह आंदोलन थमेगा नहीं।
डिजिटल एडिटर व्यू: कागजी विकास बनाम धरातल का विनाश
Dhamtari News की यह ग्राउंड रिपोर्ट सीधे तौर पर सत्ता के गलियारों में बैठे नीति-निर्माताओं को कटघरे में खड़ा करती है। जब देश में डिजिटल क्रांति और स्मार्ट विलेज की बड़ी-बड़ी बातें हो रही हों, तब छत्तीसगढ़ के एक गांव में नागरिकों को सम्मानजनक मौत और अंतिम संस्कार के हक के लिए सड़कों पर उतरने की चेतावनी देनी पड़ रही है। यह सिर्फ एक पुल का टूटना नहीं है, यह आम जनता के भरोसे का टूटना है।




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