Korba: भाजपा नेता की हत्या का मुख्य आरोपी मुस्ताक अहमद बना 'Jail से नामांकन भरने वाला आरोपी', बिझरा उपचुनाव में उतरा
- moolchand sinha

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कोरबा। क्या कोई कत्ल का आरोपी, उसी शख्स की सियासी विरासत पर अपना दावा ठोक सकता है जिसकी जान लेने का इल्जाम उस पर लगा हो? लोकतंत्र के इतिहास में विरोधाभास की एक ऐसी ही दहला देने वाली और अचरज भरी स्क्रिप्ट छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में लिखी गई है। यहाँ की बिझरा सीट पर होने जा रहे उपचुनाव में उस वक्त सनसनी फैल गई, जब भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच बिलासपुर जेल से एक वैन आकर रुकी। इस वैन से उतरे शख्स को देखकर वहाँ मौजूद लोगों की आँखें फटी की फटी रह गईं।
यह कोई साधारण उम्मीदवार नहीं, बल्कि इसी सीट के पूर्व जनप्रतिनिधि और भाजपा नेता अक्षय गर्ग की निर्मम हत्या का मुख्य आरोपी मुस्ताक अहमद था, जो अब इस चुनाव में 'Jail से नामांकन भरने वाला आरोपी' बनकर सीधे चुनावी दंगल में कूद पड़ा है। सलाखों के पीछे से निकलकर सीधे लोकतंत्र के रणमैदान में उतरने के इस अप्रत्याशित कदम ने न सिर्फ छत्तीसगढ़ की सियासत में भूचाल ला दिया है, बल्कि कानून की चौखट और सामाजिक नैतिकता के बीच एक ऐसी जंग छेड़ दी है जिसकी गूंज पूरे सूबे में सुनाई दे रही है।
विरोधाभास की पराकाष्ठा: जिसकी हत्या हुई, उसी की रिक्त सीट पर दावा!
अक्षय गर्ग की सनसनीखेज मौत के बाद बिझरा जनपद सदस्य का यह पद रिक्त हुआ था। निर्वाचन आयोग द्वारा यहाँ उपचुनाव की घोषणा की गई, लेकिन नामांकन के आखिरी दिन जो तस्वीर सामने आई, उसने सबको चौंका दिया। जिस हत्याकांड के आरोप में मुस्ताक जेल की सलाखों के पीछे दिन काट रहा है, उसी वारदात के कारण खाली हुई सीट पर वह खुद को जनता के भावी प्रतिनिधि के रूप में पेश कर रहा है। Jail से नामांकन भरने वाला आरोपी मुस्ताक अहमद कानूनी रूप से भले ही यह कदम उठाने में सफल रहा हो, लेकिन स्थानीय समाज और राजनीतिक हलकों में इसे लेकर तीखा आक्रोश है।
कानून की वो चौखट, जिसने जेल में बंद आरोपी को दी चुनावी राह
आम जनता के बीच यह सवाल उठना लाजिमी है कि संगीन जुर्म के मामले में जेल में बंद कोई व्यक्ति चुनाव कैसे लड़ सकता है? इसका जवाब भारतीय चुनाव प्रणाली के तकनीकी नियमों में छिपा है, जिसकी वजह से मुस्ताक आज Jail से नामांकन भरने वाला आरोपी बन सका:
दोषसिद्धि अनिवार्य: भारतीय जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act) के तहत सिर्फ आरोपी होने, जेल में रहने या मुकदमा चलने भर से कोई व्यक्ति अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
2 साल की सजा का पैमाना: चुनावी पाबंदी तब तक लागू नहीं होती, जब तक किसी सक्षम अदालत द्वारा आरोपी को दोषी करार देकर 2 वर्ष या उससे अधिक की सजा न सुना दी जाए।
चूंकि मुस्ताक अहमद का यह मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन (Under Trial) है, इसलिए वह तकनीकी तौर पर चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह पात्र बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता: राजनीति के अपराधीकरण को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत कई बार गहरी चिंता जता चुकी है, लेकिन कानून के इसी सुरक्षा कवच का लाभ उठाकर Jail से नामांकन भरने वाला आरोपी चुनावी समर में ताल ठोकने में कामयाब हो जाता है।
बिझरा में 'हाई अलर्ट', गर्माया सियासी पारा
मुस्ताक अहमद के इस अप्रत्याशित कदम ने बिझरा सीट के सियासी पारे को अचानक 'उबाल' पर ला दिया है। कड़े पुलिस पहरे के बीच हुए इस नामांकन के बाद क्षेत्र में तनाव और गहमागहमी का माहौल है। प्रशासन ने स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि बिझरा की जागरूक जनता Jail से नामांकन भरने वाला आरोपी के इस कदम पर, कानून की इस तकनीकी छूट और नैतिकता के तराजू पर अपना क्या फैसला सुनाती है।
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