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पिथौरा: स्वाभिमान की भट्टी में तप रहा है चित्तौड़गढ़ का इतिहास, पूर्व सांसद चुन्नी लाल साहू ने सुनी महाराणा के वंशजों की गाथा


पूर्व सांसद चुन्नी लाल साहू पिथौरा में गड़िया लोहार परिवारों से मुलाकात करते हुए
पूर्व सांसद चुन्नी लाल साहू पिथौरा में गड़िया लोहार परिवारों से मुलाकात करते हुए

पिथौरा।

अक्सर हम सड़क किनारे लोहे को आकार देते जिन परिवारों को देखते हैं, उनके पीछे सदियों पुराना त्याग और वीरता का इतिहास छिपा है। महासमुंद के पूर्व सांसद चुन्नी लाल साहू ने जब पिथौरा के दुर्गा मंदिर के सामने डेरा डाले राजस्थानी परिवारों से चर्चा की, तो रोंगटे खड़े कर देने वाला अतीत सामने आया। ये लोग कोई साधारण कारीगर नहीं, बल्कि मेवाड़ के शेर महाराणा प्रताप के वे सिपाही हैं जिन्होंने धर्म की खातिर महलों को लात मार दी थी।

मुगलों के आगे नहीं झुके, इसलिए चुना खानाबदोश जीवन

पूर्व सांसद से चर्चा करते हुए इन परिवारों ने बड़े गर्व से बताया कि वे राजपूत हैं और उनके पूर्वज चित्तौड़गढ़ के राजा महाराणा प्रताप के साथ मुगलों के विरुद्ध युद्ध में शामिल थे। हार के बाद जब उन पर धर्मांतरण का दबाव बनाया गया, तो उन्होंने अपनी आस्था और धर्म से समझौता करने के बजाय अपना राज्य, सुख-सुविधाएं और संपत्ति त्याग दी।

"धर्म न छूटे, चाहे राज छूट जाए"

इन परिवारों की अटूट श्रद्धा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सदियों बाद भी ये साल में एक बार चित्तौड़गढ़ दर्शन के लिए जाते हैं। उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक चित्तौड़ पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होता, वे स्थाई घर नहीं बनाएंगे। आज भी ये लोग उसी प्रतिज्ञा और धर्म की रक्षा के लिए कठिन जीवन जी रहे हैं।

पूर्व सांसद चुन्नी लाल साहू ने जताया गर्व

इनकी वीरता और संघर्ष की कहानी सुनकर पूर्व सांसद चुन्नी लाल साहू भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि:

"यह देश के लिए गर्व का विषय है कि आज भी हमारे बीच ऐसे लोग मौजूद हैं जिनके पूर्वजों ने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए दर-दर की ठोकरें खाना पसंद किया, लेकिन झुकना स्वीकार नहीं किया। हमें इनके स्वाभिमान और त्याग का सम्मान करना चाहिए।"

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