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अजय चंद्राकर, मधुबन: प्रशिक्षण महाअभियान में बोले- "जब राम-कृष्ण को प्रशिक्षण की जरूरत पड़ी, तो हम क्या हैं?"


[कुरूद/मगरलोड |

भारतीय जनता पार्टी के 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रशिक्षण महाअभियान' के तहत मधुबन (मगरलोड) में एक विशाल कार्यकर्ता सम्मेलन संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता,  "भाजपा के कद्दावर नेता पूर्व मंत्री विधायक अजय चंद्राकर, मधुबन में आयोजित प्रशिक्षण शिविर में शामिल हुए, जहाँ उन्होंने

अपने धारधार उद्बोधन से कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सिहावा विधानसभा में विजय का मार्ग केवल और केवल 'प्रशिक्षण' और 'अनुशासन' से होकर गुजरता है।

अजय चंद्राकर, मधुबन ने बताया प्रशिक्षण का पौराणिक महत्व

अजय चंद्राकर ने प्रशिक्षण की महत्ता को सनातन संस्कृति से जोड़ते हुए एक गहरा तर्क दिया। उन्होंने कहा कि सीखने की प्रक्रिया कभी नहीं रुकनी चाहिए।

"मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने गुरु वशिष्ठ से प्रशिक्षण लिया। स्वयं पूर्ण अवतार भगवान श्री कृष्ण ने सांदीपनि आश्रम में शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा ली और समय-समय पर अपने गुरुओं का मार्गदर्शन लिया। जब साक्षात ईश्वर को भी प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ी, तो हम साधारण कार्यकर्ताओं को निरंतर सीखते रहना चाहिए।"

उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रशिक्षण से ही समय प्रबंधन (Time Management), मर्यादित बोली और कठोर अनुशासन आता है, जो किसी भी चुनाव को जीतने के लिए प्राथमिक हथियार हैं।

सिहावा फतह का 'विजन' और कांग्रेस को खुली चुनौती

विधायक चंद्राकर ने सिहावा विधानसभा क्षेत्र की वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर चर्चा करते हुए कांग्रेस सरकार और स्थानीय नेतृत्व पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि सिहावा को जीतने के लिए एक स्पष्ट 'विजन' की जरूरत है।

92 गांवों में कांग्रेस की उपलब्धि पर सवाल

अजय चंद्राकर ने चुनौती देते हुए कहा, "आजादी के बाद से अब तक सिहावा क्षेत्र के इन 92 गांवों में कांग्रेस अपनी कोई एक बड़ी उपलब्धि बता दे। विकास के नाम पर जनता को केवल ठगा गया है।" उन्होंने धर्मांतरण के मुद्दे पर भी चिंता जताई और पंडित रविशंकर शुक्ल के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कार्यकर्ताओं को वैचारिक रूप से सजग रहने को कहा।

अंत्योदय और राष्ट्रवाद ही भाजपा का मूल मंत्र

उन्होंने कार्यकर्ताओं को याद दिलाया कि भाजपा का उद्देश्य केवल 'नेता' बनना नहीं है। हमारा लक्ष्य डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे देशभक्तों के पदचिन्हों पर चलते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति (अंत्योदय) की सेवा करना है। राजनीति हमारे लिए मेवा नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम है।


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