जहाँ कभी बनती थी 'कच्ची शराब', आज वहाँ तैयार हो रही 'देश की फौज': मिलिए छत्तीसगढ़ की उस 'फैक्ट्री' से जिसने 3 साल में दिए 30 जवान
- moolchand sinha

- Jan 17
- 3 min read

धमतरी (छत्तीसगढ़): क्या किसी जगह की मिट्टी में इतनी तासीर हो सकती है कि वहां पसीना बहाने वाला हर शख्स 'फौजी' बन जाए? सुनने में यह किसी फिल्म की कहानी लग सकती है, लेकिन छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में एक ऐसा मैदान है जिसने इसे हकीकत में बदल दिया है।
हंचलपुर का खेल मैदान... जिसे अब आसपास के लोग 'फौजियों की फैक्ट्री' कहते हैं। एसएससी (SSC-2025) के ताज़ा नतीजों ने इस मैदान की किंवदंती पर फिर से मुहर लगा दी है। एक ही दिन, एक ही मैदान और 12 युवाओं के बदन पर वर्दी।
मैदान की 'तपस्या' और मौसम की बेरुखी
यह सफलता रातों-रात नहीं मिली। बोरझरा, कोपेडीह, रामपुर, पचपेड़ी, टीपानी और गातापार जैसे गांवों के सैकड़ों युवा यहाँ अपना भविष्य तराशने आते हैं।
स्थानीय लोग बताते हैं, "यहाँ प्रैक्टिस रुकती नहीं है। कड़ाके की ठंड हो, जुलाई की भारी बरसात हो या फिर मई की झुलसाने वाली गर्मी—इस मैदान की धूल कभी नहीं बैठती।" इसी निरंतरता का नतीजा है कि पिछले 3 वर्षों में इस अकेले मैदान ने देश को 30 से अधिक जवान सौंपे हैं।
एक पिता का सपना, दो बेटों की उड़ान
इस बार के नतीजों में सबसे भावुक कर देने वाला पल कोपेडीह गांव के रात्रे परिवार के लिए आया। एक ही घर के दो सगे भाई—रोशन रात्रे और शेषराज रात्रे—का चयन एक साथ हुआ है।
रोशन रात्रे अब CISF की वर्दी पहनेंगे।
शेषराज रात्रे BSF के प्रहरी बनेंगे।
इनके पिता मनराखन लाल रात्रे, जो खुद पुलिस विभाग (वायरलेस ऑपरेटर) में सेवा दे चुके हैं, कहते हैं, "मैं थाने में ड्यूटी करता था, तो मेरे बच्चे मुझे देखकर फौज में जाने का सपना बुनते थे। आज जब दोनों बेटों का नाम लिस्ट में आया, तो लगा मेरी परवरिश सफल हो गई।"
सामाजिक क्रांति: 'बदनामी' से 'सलामी' तक
पिता मनराखन रात्रे एक कड़वी सच्चाई बयां करते हैं: "एक वक्त था जब कोपेडीह की पहचान 'कच्ची शराब' के लिए होती थी। लोग इस गांव का नाम हिकारत से लेते थे। लेकिन हमारे युवाओं ने ठान लिया कि इस दाग को धोना है। आज 30 फौजी देने के बाद, यह 'शराबियों का गांव' नहीं, बल्कि 'सिपाहियों का गांव' बन गया है।"
दिवाली पर पहले यहाँ जलता है दीया

हंचलपुर का यह मैदान युवाओं के लिए महज दौड़ने की जगह नहीं, बल्कि एक 'मंदिर' है। इसकी पवित्रता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है:
कृतज्ञता: दिवाली के दिन युवा अपने घरों में रोशनी करने से पहले, इस मैदान पर आकर दीये जलाते हैं।
राष्ट्रीय पर्व: 15 अगस्त और 26 जनवरी को यहाँ शान से तिरंगा फहराया जाता है।
लकी ग्राउंड: युवाओं का मानना है कि इस मिट्टी को छूकर जिसने भी ईमानदारी से मेहनत की, वह खाली हाथ नहीं लौटा।
हंचलपुर के 'सितारे' (चयनित युवाओं की सूची)
इस वर्ष एसएससी जीडी (SSC GD) के माध्यम से पैरामिलिट्री फोर्स में अपनी जगह पक्की करने वाले जांबाज:
प्रदीप कुमार साहू: CRPF (ग्राम हंचलपुर)
दीपक कुमार: CISF
प्रताप कुमार: ITBP
खेमेंद्र कुमार: CISF
रोशन रात्रे: CISF (सगे भाई)
शेषराज रात्रे: BSF (सगे भाई)
डोमेश कुमार: BSF
डुमेश कुमार: CRPF
हेमलाल साहू: CRPF
गजेंद्र ठाकुर: CRPF
(विशेष: इस सूची में दो युवतियों का चयन भी शामिल है, जो साबित करता है कि बेटियां भी अब किसी से कम नहीं हैं।)
हंचलपुर की यह कहानी संसाधनों के अभाव में रोने वाले लोगों के लिए एक सबक है। यह बताती है कि अगर जज़्बा सच्चा हो, तो गांव की पगडंडी भी सफलता के हाईवे तक ले जाती है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले सालों में यह 'फैक्ट्री' देश को और कितने नायाब हीरे देती है।






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