देहदान कर अमर हुए देवसिंह सोनबेर: जीवन में सेवा, विदाई में ज्ञानदान — मृत्यु के बाद भी रोशन करेंगे चिकित्सा जगत का मार्ग
- moolchand sinha

- Nov 10, 2025
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कुरुद।
कुछ व्यक्तित्व कालजयी होते हैं — वे समय के साथ खोते नहीं, बल्कि समाज के मार्गदर्शक बन जाते हैं। नवागांव (कुरुद) के सम्माननीय, सरल-जीवन उच्च-आदर्शों वाले श्री देवसिंह सोनबेर (4 दिसंबर 1943 – 6 नवंबर 2025) का 81 वर्ष की आयु में स्वर्गवास हो गया, पर उनकी अंतिम इच्छा ने उन्हें अमर कर दिया।
उन्होंने अपनी देह को मेडिकल कॉलेज, रायपुर को दान कर दी — ताकि उनकी देह भावी चिकित्सकों के शिक्षण और मानवता की सेवा में योगदान देती रहे।
यह निर्णय केवल देहदान नहीं—जीवन का अंतिम और सर्वोच्च ज्ञानदान है।
मृत्यु नहीं, ज्ञान का आरंभ
जीवन भर कर्मयोग के मार्ग पर चले श्री सोनबेर ने विदा के समय ज्ञानयोग का अद्भुत उदाहरण रखा।
उनकी देह अब मेडिकल छात्रों के लिए वैज्ञानिक अध्ययन और चिकित्सा शिक्षा का अनमोल स्रोत बनेगी।
वे भले देह से शून्य हुए हों, पर
“हर छात्र, हर पाठ और हर सीख में उनका अस्तित्व जीवित रहेगा।”
वे आधुनिक युग के दधीचि हैं — जिन्होंने मानव कल्याण के लिए स्वयं को अर्पित कर दिया।
राष्ट्रसेवा से मानवसेवा तक का पवित्र सफर
उच्च संस्कारों में पले-बढ़े श्री सोनबेर ने राष्ट्र सेवा को जीवन का प्रथम धर्म माना।
भारतीय सेना में मिलिट्री वारंट ऑफिसर के रूप में उनका अनुशासन और समर्पण अद्वितीय रहा।
सेना से निवृत्ति के बाद उन्होंने भारतीय डाक विभाग में डाक निरीक्षक एवं पोस्ट मास्टर जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन किया।
वे जहाँ भी रहे — अनुशासन, सत्यनिष्ठा और कर्तव्यपरायणता की मिसाल बने रहे।
संत स्वभाव और आध्यात्मिक दृष्टि
जीवन में सरलता, व्यवहार में संतत्व और मन में आध्यात्मिकता — यही श्री सोनबेर का परिचय रहा।
सदगुरू श्री अभिलाष साहेब जी और कबीर पारख संस्थान से प्रेरणा तथा
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी, माउंट आबू से गहरा भावनात्मक जुड़ाव —
उनके जीवन को अध्यात्म, विनम्रता और सद्भाव से आलोकित करता रहा।
वे उपदेशों से नहीं, जीवन जीने की शैली से प्रेरणा देने वाले व्यक्तित्व थे।
ज्ञान, संस्कार और मानवीयता की विरासत
स्व. श्रीमती जेठी बाई साहू एवं स्व. श्री शिवप्रसाद साहू के संस्कारों से पल्लवित श्री सोनबेर अपने पीछे एक प्रतिष्ठित परिवार छोड़ गए—
पुत्र मुरलीधर, देवेन्द्र दास (संत), धनेश्वर एवं नाती–पोते।
उनकी धरोहर —
चरित्र की दृढ़ता, सेवा का व्रत, आध्यात्मिक सौम्यता और ज्ञान का अनंत दीप।
आने वाले वर्षों तक मेडिकल कॉलेज में जब विद्यार्थी मनुष्य शरीर का अध्ययन करेंगे,
वे महसूस करेंगे कि एक पुण्यात्मा उन्हें जीवन के रहस्य सिखा रही है।








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