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​धमतरी: जब खाकी सोती रही, गांव जाग गया... चरमुड़िया में अवैध शराब के खिलाफ 'जन-विद्रोह' की ग्राउंड रिपोर्ट


कुरूद।

लोकतंत्र का एक कड़वा सच है— जब 'वर्दी' अपना फर्ज भूल जाती है और 'फाइलें' धूल फांकने लगती हैं, तो समाज को अपनी रक्षा के लिए खुद सड़क पर उतरना पड़ता है।

​छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के ग्राम पंचायत चरमुड़िया में आज जो हुआ, वह केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि प्रशासन के गाल पर एक तमाचा था। नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार से त्रस्त ग्रामीणों ने जब देखा कि पुलिस प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है, तो सतनामी समाज और ग्रामीणों ने 'सिस्टम' का इंतजार करना छोड़ दिया और खुद 'एक्शन' मोड में आ गए।

​ग्राउंड रिपोर्ट: क्या हुआ आज चरमुड़िया में?

​आज गांव की सड़कों पर एक अलग ही मंजर था। हाथों में बैनर और आंखों में आक्रोश लिए युवाओं और बुजुर्गों का हुजूम उन गलियों में घूमा, जिन्हें नशे के सौदागरों ने अपना अड्डा बना लिया था।

सख्त फरमान: ग्रामीणों ने अवैध शराब बेचने वालों को स्पष्ट चेतावनी दी है— "या तो धंधा बंद करो, या गांव छोड़ो।"

दुकानों पर दबिश: भीड़ ने उन दुकानों का घेराव किया जहां चोरी-छिपे शराब परोसी जा रही थी। यह कोई राजनीतिक रैली नहीं थी, बल्कि अपने बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए उठी एक सामूहिक आवाज थी।

डिस्पोजल कल्चर पर प्रहार: ग्रामीणों ने दुकानों में बिक रहे डिस्पोजल गिलास और पानी के पाउच पर भी प्रतिबंध लगा दिया है, क्योंकि यही चीजें खुले में शराबखोरी (Open Drinking) को बढ़ावा दे रही थीं।

​बड़ा खुलासा: 'रक्षक ही भक्षक?' सरपंच ने खोली सिस्टम की पोल

​इस पूरे आंदोलन के दौरान 'Breaking Now' के संपादक मूलचंद सिन्हा ने जब सरपंच प्रतिनिधि तेजेन्द्र तोड़ेकर से बात की, तो जो तथ्य सामने आए वे चौंकाने वाले थे। यह खुलासा बताता है कि नशा मुक्ति अभियान क्यों विफल हो रहा है।

"पुलिस का सहयोग जीरो है... सरकारी भट्ठी ही असली विलेन है।"


​सरपंच प्रतिनिधि ने सीधे तौर पर प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया:

पुलिस की भूमिका संदिग्ध: पंचायत ने अवैध बेचने वालों की लिस्ट बनाई, और थाने में अधिकारियों को बुलाया। लेकिन पुलिस ने सहयोग करना तो दूर ही है

सरकारी संरक्षण में कालाबाजारी: सरपंच प्रतिनिधि का सबसे गंभीर आरोप यह है कि गांव में अवैध शराब का मुख्य स्रोत (Source) सरकारी शराब भट्ठियां हैं। वहां से नियमों को ताक पर रखकर, थैला में भरकर शराब 'ब्लैक' में निकाली जाती है, जो बाद में गांव में खपा दी जाती है।

सप्लाई चेन: कुरूद की तरफ से भी अवैध सप्लाई लगातार जारी है, जिसे रोकने वाला कोई नहीं।


​चरमुड़िया की यह घटना केवल एक गांव की कहानी नहीं है, यह पूरे सिस्टम का 'आईना' है।

  • ​एक तरफ सरकार नशामुक्ति के बड़े-बड़े दावे करती है।

  • ​दूसरी तरफ एक महिला जनप्रतिनिधि (सरपंच) चीख-चीख कर कह रही है कि सरकारी सिस्टम ही अवैध शराब सप्लाई कर रहा है।

​आज चरमुड़िया में 'खाकी' सुस्त थी, इसलिए समाज की 'लाठी' (एकता) को जागना पड़ा। ग्रामीणों का यह धैर्य अब जवाब दे चुका है। अब सवाल यह है कि इस जन-आंदोलन के बाद क्या पुलिस अपनी कुंभकर्णी नींद से जागेगी, या फिर किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार करेगी?

​फिलहाल, चरमुड़िया के ग्रामीणों ने यह साबित कर दिया है कि अगर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से भागेगा, तो जनता अपनी सुरक्षा खुद करेगी।

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