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धमतरी: थाने की चौखट पर कानून शर्मिंदा, भीतर व्यवस्था निश्चिंत—कोतवाली के सामने आधे घंटे तक चलता रहा उत्पात


धमतरी।

जिस सिटी कोतवाली को आम आदमी संकट की घड़ी में आख़िरी सहारा मानता है, उसी थाने के सामने कानून की हालत ऐसी दिखी कि भरोसे की नींव हिल गई। अपराधों के खुलासों और कार्रवाईयों के बीच आत्मविश्वास में दिख रहा पुलिस प्रशासन उस वक्त कटघरे में आ खड़ा हुआ, जब थाने की दहलीज पर ही कानून आधे घंटे तक मदद की गुहार लगाता रहा—और व्यवस्था भीतर खामोशी ओढ़े बैठी रही।

कोतवाली के सामने बेखौफ अराजकता

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शहर का एक गरीब फेरीवाला अपनी रोजी-रोटी की गाड़ी लेकर सिटी कोतवाली थाना परिसर के सामने वाली मुख्य सड़क से गुजर रहा था। तभी हाल ही में जेल से रिहा हुआ एक युवक सामने आया और उसने जबरन फेरीवाले की गाड़ी रोक ली। देखते ही देखते गाड़ी को धक्का देकर सड़क पर गिरा दिया गया और उसमें रखे सामान को छीनने की कोशिश शुरू हो गई।

जब पीड़ित ने विरोध किया, तो आरोपी और उग्र हो गया। थाना परिसर के मुख्य द्वार के ठीक सामने गाली-गलौज और मारपीट का प्रयास किया गया। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि अपराधी के चेहरे पर न कानून का डर दिखा, न पुलिस की मौजूदगी का कोई असर—मानो उसे पूरा भरोसा हो कि यहां कोई रोकने वाला नहीं।

30 मिनट तक चलता रहा ‘कानूनी सन्नाटा’

घटना के दौरान पीड़ित फेरीवाला बार-बार थाने की ओर देखता रहा, हाथ जोड़कर मदद की गुहार लगाता रहा। बताया जा रहा है कि करीब आधे घंटे तक यह हंगामा चलता रहा, लेकिन इस दौरान न कोई पुलिसकर्मी बाहर आया, न किसी अधिकारी ने हस्तक्षेप करना जरूरी समझा।

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब आसपास मौजूद लोगों ने कंट्रोल रूम में फोन कर घटना की सूचना दी। इसके बावजूद तत्काल कार्रवाई का अभाव लोगों के गुस्से और हैरानी का कारण बना हुआ है। सवाल यह नहीं कि पुलिस क्यों नहीं आई, सवाल यह है कि थाने के सामने भी कानून क्यों नहीं चला?

शासन-प्रशासन कटघरे में

यह घटना सिर्फ एक फेरीवाले के साथ हुई बदसलूकी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुलिस की निगरानी व्यवस्था, क्विक रिस्पॉन्स सिस्टम और प्रशासनिक जवाबदेही पर सीधा सवाल है। जब जिला मुख्यालय की कोतवाली के सामने अपराधी इस तरह बेखौफ होकर उत्पात मचा सकते हैं, तो शहर की बाकी गलियों और मोहल्लों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

स्थानीय लोगों में नाराजगी

घटना के बाद इलाके में आक्रोश का माहौल है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अगर थाने के सामने ही पीड़ित को समय पर मदद नहीं मिलती, तो आम आदमी खुद को सुरक्षित कैसे माने। लोगों के बीच यह चर्चा आम है कि कानून के नाम पर सिर्फ दावे और पोस्टर रह गए हैं, जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है।


सिटी कोतवाली के सामने हुआ यह उत्पात कानून के इकबाल की खुली परीक्षा है। यह घटना साफ संदेश देती है कि सुरक्षा केवल आंकड़ों, प्रेस नोट और दावों से नहीं आती, बल्कि समय पर की गई ठोस कार्रवाई से आती है। अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं—क्या इस मामले में जिम्मेदारी तय होगी, या यह भी अन्य घटनाओं की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगी।

जनता जवाब चाहती है, आश्वासन नहीं।

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