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धमतरी में 'बटन वाले चाकू' का खूनी स्वैग: दोस्त की निकाल दीं आंतें, क्या शहर में खाकी का इकबाल 'रिफर' हो गया है?

धमतरी। छत्तीसगढ़ की धार्मिक और शांत नगरी धमतरी अब लहूलुहान है। सिहावा चौक की उस काली रात ने शहर की सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। सवाल सिर्फ एक मामूली विवाद का नहीं है, सवाल उस मानसिकता का है जिसमें एक 21 साल का युवक जेब में 'बटन वाला चाकू' लेकर निकलता है और बेखौफ होकर अपने ही साथी की आंतें बाहर निकाल देता है। क्या धमतरी की पुलिस सिर्फ लाशें गिनने और घायलों को रायपुर 'रिफर' करने के लिए बैठी है?

​'रिफरल कार्ड' और एफआईआर की कागजी खानापूर्ति— आखिर कब तक?

​धमतरी पुलिस की कार्यप्रणाली पर आज हर नागरिक सवाल उठा रहा है। घटना हुई, आरोपी पकड़ा गया, चाकू बरामद हुआ और केस डायरी भर दी गई—क्या पुलिस की जिम्मेदारी यहीं खत्म हो जाती है?​

इमरजेंसी वार्ड बना कुरुक्षेत्र: मनीष सिन्हा अस्पताल के बेड पर अपनी उधड़ी हुई आंतों और जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहा है। पुलिस की फाइलों में वह सिर्फ एक 'धारा 109' का केस है, लेकिन एक परिवार के लिए वह उजड़ता हुआ संसार है।​

इंटेलिजेंस का दीवाला: शहर के बीचों-बीच प्रतिबंधित 'स्प्रिंग चाकू' कैसे पहुँच रहे हैं? क्या पुलिस का मुखबिर तंत्र सो गया है या फिर इन अपराधियों को किसी सफेदपोश का संरक्षण प्राप्त है?

​ हौसले पस्त करने के लिए 'थर्ड डिग्री खौफ' की दरकार

​अब वक्त आ गया है कि पुलिस प्रशासन अपनी 'गांधीवादी पुलिसिंग' को किनारे रखकर अपराधियों के मन में कयामत का डर पैदा करे।​अपराध की पाठशाला और सार्वजनिक परेड: धमतरी की जनता पूछ रही है कि क्या इन अपराधियों को केवल जेल भेजना काफी है? क्यों न ऐसे नृशंस हमलावरों की सड़कों पर परेड निकाली जाए, ताकि 'स्वैग' के नाम पर चाकू लहराने वाले अन्य गुंडों की रूह कांप जाए?​हॉटस्पॉट्स पर 'सर्जिकल स्ट्राइक': सिहावा चौक, स्टेशन पारा और सुंदरगंज वार्ड जैसे इलाकों में पुलिस की गश्त सिर्फ औपचारिकता क्यों है? क्या पुलिस अब घर-घर तलाशी अभियान चलाएगी ताकि किसी और की जेब से 'मौत का बटन' न निकले?​

सिस्टम का मजाक: 

21 साल का साहिल खत्री पुलिस के घेरे में भी बेखौफ दिखता है। उसे पता है कि कानून की गलियां उसके लिए खुली हैं। पुलिस के 'इकबाल' पर इससे बड़ा तमाचा और क्या होगा?

​ मौत की आहट और खाकी की खामोशी

"सिहावा चौक की हवा आज सर्द नहीं, बल्कि मनीष सिन्हा के खून की गंध से भारी है। एक तरफ अस्पताल में चीखें हैं और दूसरी तरफ पुलिस की वही घिसी-पिटी 'त्वरित कार्रवाई' वाली प्रेस विज्ञप्ति। क्या धमतरी की सड़कों पर सुरक्षित घर लौटना अब केवल एक संयोग मात्र रह गया है?"

​ वर्दी की साख अब दांव पर है!

​अगर धमतरी पुलिस ने अब भी अपनी रणनीति नहीं बदली, तो वह दिन दूर नहीं जब शहर का हर चौक एक 'क्राइम सीन' में तब्दील हो जाएगा। गिरफ्तारी की फोटो खिंचवाकर पीठ थपथपाने का दौर खत्म होना चाहिए। अब वक्त है 'जीरो टॉलरेंस' का। पुलिस को यह साबित करना होगा कि वर्दी का रंग आज भी चाकू की धार से कहीं ज्यादा प्रभावशाली है।

धमतरी प्रशासन को खुली चेतावनी: घायल मनीष का दर्द पूरे शहर का दर्द है। अगर अपराधियों के हौसले पस्त नहीं हुए, तो जनता का यह गुस्सा सड़कों पर फूटेगा। अब 'पाठशाला' में क्लास अपराधियों की लगनी चाहिए, ताकि अगली बार कोई भी हथियार उठाने से पहले सौ बार सोचे।

ब्यूरो रिपोर्ट: धमतरी क्राइम वॉच (जनता की आवाज)

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