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​धमतरी शिक्षक रहस्य: 28 दिसंबर की वो 'आखिरी छुट्टी' और 38 दिनों का सन्नाटा; अब सिस्टम ने छीना परिवार का निवाला!


धमतरी।

छत्तीसगढ़ के शांत धमतरी जिले का ग्राम बोड़रा इन दिनों एक ऐसी अनसुलझी पहेली का केंद्र बन गया है, जिसने शिक्षा विभाग से लेकर पुलिस महकमे तक की नींद उड़ा दी है। एक शिक्षक, जो कल तक ब्लैकबोर्ड पर बच्चों को जीवन के पाठ पढ़ाता था, आज खुद जिंदगी के किसी गुमनाम पन्ने पर लापता है। शिक्षक मनोज देवदास, जो बीते 28 दिसंबर से ओझल हैं, उनकी कहानी अब केवल एक 'मिसिंग रिपोर्ट' नहीं रही, बल्कि सिस्टम की संवेदनाओं पर एक बड़ा सवालिया निशान बन गई है।

रहस्यमयी 28 दिसंबर:

क्या हुआ था उस दिन?

मनोज देवदास 15 दिनों की स्वीकृत छुट्टी पर थे। उम्मीद थी कि छुट्टी के बाद वे नई ऊर्जा के साथ स्कूल लौटेंगे, लेकिन नया साल उनकी चौखट पर खुशियों के बजाय सन्नाटा लेकर आया।

गुमशुदगी या साजिश? छुट्टी खत्म होने के बाद न तो वे स्कूल पहुंचे और न ही घर लौटे।

परिजनों का दर्द:

"हर आहट पर लगता है कि वो आ गए," यह कहते हुए परिजनों के आंसू नहीं थमते। धमतरी सिटी कोतवाली में रिपोर्ट तो दर्ज है, पर पुलिस के हाथ अब भी खाली हैं।

प्रशासनिक वज्रपात: "जख्म पर नमक" जैसा फैसला

एक ओर परिवार का मुखिया गायब है, दूसरी ओर शिक्षा विभाग के नियमों की 'ठंडी फाइलों' ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने परिवार की कमर तोड़ दी।

रुका हुआ वेतन:

बिना सूचना अनुपस्थिति के आधार पर विभाग ने मनोज देवदास का वेतन तत्काल प्रभाव से रोक दिया है।

नौकरी पर खतरा:

जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) अभय जायसवाल का कहना है कि यदि 90 दिनों (3 माह) तक शिक्षक की स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तो सेवा से बर्खास्तगी (Dismissal) की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।

बड़ा सवाल:

जिस परिवार का सहारा लापता हो, क्या उसका वेतन रोकना न्यायसंगत है? क्या सिस्टम का काम केवल दंड देना है या संकट में साथ खड़ा होना भी?

एक खाली कुर्सी की कहानी

बोड़रा के प्राथमिक शाला में मनोज देवदास की वह खाली कुर्सी आज चीख-चीख कर सवाल पूछ रही है। विभाग ने वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर दूसरे शिक्षकों को तो लगा दिया है, ताकि बच्चों की पढ़ाई न रुके, लेकिन उन बच्चों के मन में बैठे उस 'प्रिय गुरुजी' का क्या, जो अचानक बिना 'अलविदा' कहे चले गए?

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