मिट्टी की महक और पुरखों की गाथा: कुरूद की धरा पर 'पुनेम गोंडी गाथा' ने रचा इतिहास, उमड़ा जनसैलाब!
- moolchand sinha

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कुरूद।
छत्तीसगढ़ की पावन धरा का हृदय स्थल कहा जाने वाला कुरूद नगर इन दिनों एक अलौकिक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ऊर्जा से ओतप्रोत है। पचरी पारा स्थित प्राचीन शीतला मंदिर की छांव में शुरू हुआ यह आयोजन अब एक विशाल जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। अवसर है पाँच दिवसीय 'पुनेम गोंडी गाथा' का, जहाँ धर्म, परंपरा और लोक संस्कृति की ऐसी त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है, जिसने न केवल श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों की ओर लौटने का एक सशक्त मार्ग भी दिखाया है।
भव्य कलश यात्रा: श्रद्धा का वह समंदर जिसने नगर को थाम दिया
आयोजन का शुभारंभ किसी उत्सव की भांति नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक क्रांति की तरह हुआ। शीतला मंदिर से जब अंगा देवता की अगुवाई में भव्य कलश यात्रा निकली, तो समूचा कुरूद नगर थम सा गया।
पारंपरिक छटा: मांदर की थाप और पारंपरिक वेशभूषा में सजे पुरुष और मंगल गीत गाती मातृशक्ति ने वातावरण को दिव्यता से भर दिया।
आत्मीय स्वागत: नगर के हर चौराहे और गली में श्रद्धालुओं ने पुष्प वर्षा कर शोभायात्रा का स्वागत किया, जो इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता के दौर में भी देवी-देवताओं और लोक परंपराओं के प्रति जन-विश्वास अडिग है।
📜 गोंडी गाथा: कथावाचक शंकर शाह हिरपाची ने जगाई संस्कृति की अलख
मुख्य खेल मैदान में सजे भव्य पांडाल में प्रसिद्ध कथावाचक शंकर शाह हिरपाची अपनी ओजस्वी वाणी से समाज को संस्कारित कर रहे हैं। गाथा के दूसरे दिन उन्होंने विशेष रूप से:
उत्पत्ति का रहस्य: गोंडवाना की उत्पत्ति और सरला-गाघरा के ऐतिहासिक व आध्यात्मिक महत्व को विस्तार से समझाया।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: जन्म, विवाह और मृत्यु जैसे सोलह संस्कारों की वैज्ञानिकता को उजागर करते हुए उन्होंने बताया कि गोंडी संस्कृति केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक उत्तम विज्ञान है।
जड़ों से जुड़ाव: उन्होंने हुंकार भरते हुए कहा कि "संस्कारों को बचाना ही समाज का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए", क्योंकि जो समाज अपनी संस्कृति को भूल जाता है, वह अपना अस्तित्व खो देता है।
जनप्रतिनिधियों की गौरवमयी सहभागिता

इस महाआयोजन की गरिमा तब और बढ़ गई जब क्षेत्रीय विधायक अजय चंद्राकर एवं विधायक प्रतिनिधि भानु चंद्राकर ने कार्यक्रम में शिरकत की। उन्होंने देव-शक्तियों की विशेष पूजा-अर्चना कर क्षेत्र की सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। विधायक चंद्राकर ने लोक संस्कृति के संरक्षण के इस भगीरथ प्रयास की मुक्त कंठ से सराहना की।
सामाजिक संकल्प और भविष्य की दिशा
माँ अंगार मोती ट्रस्ट के अध्यक्ष जीवराखन मरई ने समाज को संबोधित करते हुए एक गंभीर और प्रेरक बात कही। उन्होंने कहा कि गोंडी धर्म और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए नई पीढ़ी को इन आयोजनों से जोड़ना अनिवार्य है। यह आयोजन मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और अखंडता का प्रतीक है।
आकर्षण का केंद्र: जो इस आयोजन को बनाता है खास
सांस्कृतिक धरोहर: पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज और बुजुर्ग महिलाओं द्वारा गाए गए 'मंगल गीत' आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार कर रहे हैं।
युवा उत्साह: आयोजन में युवाओं की भारी भागीदारी ने यह संदेश दिया है कि गोंडवाना की गौरवगाथा अब सुरक्षित हाथों में है।
कुशल प्रबंधन: सफलता के पीछे के सारथी
इस महाआयोजन को सुचारू बनाने में ललित ठाकुर, तेजराम छेदैहा, संतोष सोरी, शिवदयाल नेताम , रामेश्वर ध्रुव, कमलेश ध्रुव,सत्यवान
और राजकुमारी ध्रुव सहित पूरी टीम दिन-रात समर्पित है। वरिष्ठ पत्रकारों बसंत रूप एवं भूपेंद्र ध्रुव के मार्गदर्शन में यह आयोजन व्यवस्थित रूप से संचालित हो रहा है।
कुरूद की यह पावन धरा आज केवल एक कार्यक्रम की साक्षी नहीं है, बल्कि यह गोंडवाना के गौरवमय इतिहास और आदिम संस्कृति के पुनरुत्थान का केंद्र बन गई है।






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