सिवनीकला का '31 दिसंबर': सहानुभूति की सियासी बलि या भ्रष्टाचार की 'इच्छा मृत्यु'?
- moolchand sinha

- Dec 31, 2025
- 3 min read

कुरूद (धमतरी) |
साल 2024 का सूर्यास्त ग्राम सिवनीकला के लिए सामान्य नहीं था। जिस तारीख को 'न्याय का शंखनाद' होना था, वह तारीख आरोपों के 'पोस्टमॉर्टम' में बदल गई। सपरिवार 'इच्छा मृत्यु' की मार्मिक गुहार से शुरू हुआ यह हाई-वोल्टेज ड्रामा 31 दिसंबर को उस वक्त धराशायी हो गया, जब धरना स्थल पर भीड़ की जगह सन्नाटा और आरोपों की जगह दस्तावेज़ों ने ले ली।
'इच्छा मृत्यु' का दांव: मास्टरस्ट्रोक या सियासी ढाल?
पूर्व सरपंच ईश्वर लाल साहू द्वारा प्रशासन को अल्टीमेटम दिया गया था—"प्रताड़ना रुकी नहीं, तो जान दे देंगे।" बांधापारा और चम्पेश्वरपारा के चौक चिन्हित थे, समय तय था। लेकिन जब 31 दिसंबर की सुबह हुई, तो वह तेवर नदारद थे जिसने शासन की नींद उड़ाई थी।
चुभता सवाल: क्या 'इच्छा मृत्यु' का वह भावुक पत्र सिर्फ एक 'प्रेशर पॉलिटिक्स' का हिस्सा था? क्या यह प्रशासन को बैकफुट पर लाने की एक ऐसी चाल थी जो ऐन वक्त पर खुद ही मात खा गई?
सन्नाटे की गूँज: जब मैदान से गायब हुआ 'योद्धा'
राजनीति में अनुपस्थिति (Absence) उपस्थिति से ज्यादा शोर करती है। 31 दिसंबर को सिवनीकला के बाजारों में जो सन्नाटा था, उसने पूर्व सरपंच की साख पर कई सवालिया निशान खड़े कर दिए। ग्रामीणों के बीच अब यह चर्चा आम है कि— "अगर ज़ख्म गहरे थे, तो मरहम के लिए मैदान में क्यों नहीं उतरे?" आंदोलन का अचानक थम जाना रणनीतिक चूक थी या किसी छिपे हुए सच का डर?
3. 'फाइल' का पलटवार: जब भ्रष्टाचार ने मारी एंट्री
जैसे ही धरना स्थल पर सन्नाटा पसरा, विरोधियों ने अपनी चुप्पी तोड़ी और वह भी सबूतों के साथ। टकेश्वर चंद्राकर और पूर्व पंचों की टोली सीधे कलेक्टर जनदर्शन पहुंची। उनकी दलीलें किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर देंगी:
मद का मायाजाल: आरोप है कि वर्ष 2024-25 के दौरान पंचायत के सरकारी खजाने से चार बार संदिग्ध तरीके से राशि निकाली गई।
जांच की आहट: जनपद पंचायत कुरूद द्वारा गठित 'जांच समिति' की सक्रियता ही क्या इस पूरे विवाद की असली जड़ है?
इत्तेफाक या साजिश: जैसे ही जांच समिति ने फाइलों के पन्ने पलटना शुरू किए, वैसे ही 'मानसिक प्रताड़ना' और 'इच्छा मृत्यु' के शब्द गूंजने लगे। विरोधियों का सीधा आरोप है— "यह न्याय की गुहार नहीं, जांच से बचने का सुरक्षा कवच है।"
विश्वसनीयता की कसौटी पर सिवनीकला
अब मामला ईश्वर लाल साहू बनाम प्रशासन नहीं, बल्कि सच्चाई बनाम सहानुभूति का हो चुका है। सिवनीकला की चौपालों पर अब दो फाड़ हैं:
एक खेमा इसे एक सीधे-सादे जनप्रतिनिधि को फंसाने की साजिश मान रहा है।
दूसरा खेमा इसे "चोरी और ऊपर से सीनाजोरी" का क्लासिक उदाहरण बता रहा है।
अंतिम विश्लेषण: 31 दिसंबर का सबक
31 दिसंबर अब कैलेंडर की कोई मामूली तारीख नहीं रही। इसने तय कर दिया कि आधुनिक राजनीति में केवल 'इमोशनल कार्ड' खेलकर आप कानूनी जांच की आंच से नहीं बच सकते। धरना न होना इस कहानी का वह 'क्लाइमेक्स' है जिसने हीरो और विलेन की परिभाषा ही उलझा दी है।
निष्कर्ष: दस्तावेज़ कभी झूठ नहीं बोलते, और अब गेंद प्रशासन के पाले में है। क्या जांच समिति उन वित्तीय सुरागों तक पहुँच पाएगी जिनका दावा विरोधी कर रहे हैं, या पूर्व सरपंच वाकई किसी बड़ी प्रताड़ना के शिकार हैं? जवाब जो भी हो, 31 दिसंबर ने सिवनीकला की राजनीति पर एक ऐसा दाग छोड़ दिया है जिसे मिटाने में कई साल लगेंगे।
सिवनीकला पॉलिटिकल वॉर: सपरिवार मौत की मांग करने वाले पूर्व सरपंच मैदान से क्यों रहे गायब? क्या 'भ्रष्टाचार की फाइल' ने रोक दी आंदोलन की राह? पढ़िए 31 दिसंबर की पूरी इनसाइड स्टोरी।








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