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​सिस्टम की 'अंधेरी मोड़' पर बुझ गया वीरता का गौरव पालने वाला चिराग: कुरूद का 'डेथ जोन' और प्रशासनिक हत्या की कहानी


राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार विजेता जान्हवी राजपूत के पिता स्वर्गीय भारत भूषण ठाकुर कुरूद
राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार विजेता जान्हवी राजपूत के पिता स्वर्गीय भारत भूषण ठाकुर कुरूद

कुरूद।

कहते हैं कि साहस विरासत में मिलती है, लेकिन जब उस साहस को गढ़ने वाला शिल्पकार ही व्यवस्था की सड़न का शिकार हो जाए, तो सवाल केवल विभाग पर नहीं, बल्कि समूचे लोकतंत्र पर खड़े होते हैं। धमतरी जिले का कुरूद-मेघा रोड स्थित चरमुड़िया तिराहा अब महज़ एक मोड़ नहीं, बल्कि 'खूनी जंक्शन' बन चुका है। गुरुवार शाम यहाँ जो हुआ, उसने न केवल एक परिवार उजाड़ा, बल्कि छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक दावों की धज्जियां उड़ा दीं।

वीर बेटी के पिता का 'प्रशासनिक मर्डर'

इस हादसे की सबसे टीस देने वाली सच्चाई यह है कि जान गंवाने वाले भारत भूषण ठाकुर (48) उस जांबाज बिटिया जान्हवी राजपूत के पिता थे, जिसने अपनी जान जोखिम में डालकर अपने छोटे भाई को बचाया और तत्कालीन राष्ट्रपति के हाथों बाल वीरता पुरस्कार हासिल किया।

जिस पिता ने अपनी बेटी को विपरीत परिस्थितियों से लड़ना सिखाया, वह खुद पीडब्ल्यूडी (PWD) और पुलिस विभाग की लापरवाही के बिछाए 'मौत के जाल' से नहीं लड़ सके। तीन बेटियों और एक बेटे के सिर से साया उठ गया है। क्या एक वीर बेटी को देश की व्यवस्था यही ईनाम देती है?

यातायात 'उड़न दस्ता': जो केवल फाइलों में उड़ रहा है

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रहार यातायात उड़न दस्ते और परिवहन विभाग पर होता है। नियम कहते हैं कि भारी वाहनों और रेत माफियाओं की बेलगाम रफ्तार पर लगाम कसने के लिए ये दस्ते सड़कों पर तैनात रहेंगे। लेकिन हकीकत यह है:

सफ़ेद हाथी बना दस्ता:

करोड़ों के बजट और गाड़ियों से लैस उड़न दस्ते को सड़कों पर रेत से लदे 'यमदूतों' (हाईवा) की ओवरस्पीडिंग नज़र क्यों नहीं आती?

हफ्ता वसूली का आरोप:

स्थानीय लोगों का आरोप है कि उड़न दस्ते की सक्रियता केवल कागजों और नाकों पर वसूली तक सीमित है। अगर ये दस्ते सड़कों पर मुस्तैद होते, तो क्या एक बेलगाम हाईवा (CG 05 L 9584) इतनी बेखौफ रफ्तार से रिहायशी इलाकों की सड़कों पर दौड़ पाता?

अंधा कानून, अंधी सड़के:

ज्योति राइस मिल के पास का यह मोड़ 'डेंजर जोन' है। यहाँ न स्टॉपर हैं, न रेडियम संकेत और न ही उड़न दस्ते की कोई पेट्रोलिंग। यह स्पष्ट रूप से 'प्रशासनिक हत्या' है।

हादसे का मंजर:

जब कार बनी लोहे का ढेर

गुरुवार शाम 6:30 बजे, भारत भूषण ठाकुर अपनी वैगनआर से शोक कार्यक्रम से लौट रहे थे। उन्हें क्या पता था कि सामने से आ रहा हाईवा उनके परिवार के लिए उम्र भर का शोक लेकर आ रहा है। टक्कर इतनी भीषण थी कि कार का अगला हिस्सा पूरी तरह पिचक गया। रायपुर ले जाते समय रास्ते में ही उनकी सांसों ने साथ छोड़ दिया।

"यह एक्सीडेंट नहीं है। जब विभाग को पता है कि यह डेंजर जोन है और फिर भी वहां स्पीड ब्रेकर या लाइट नहीं लगाई गई, तो इसे हत्या क्यों न माना जाए?" — आक्रोशित नगरवासी

रेत माफिया और सरकारी साठगांठ

महानदी से दिन-रात अवैध और वैध रेत परिवहन करने वाले हाईवा इस क्षेत्र के लिए आतंक का पर्याय बन चुके हैं। खनिज विभाग और पुलिस की चुप्पी यह बताने के लिए काफी है कि रसूखदारों के सामने आम आदमी की जान की कीमत कौड़ियों के बराबर है। शुक्रवार को जब भारत भूषण की अंतिम विदाई हुई, तो उमड़े जनसैलाब की आंखों में आंसू कम और सिस्टम के खिलाफ गुस्सा ज्यादा था।

सुलगते सवाल:

क्या अब भी यातायात उड़न दस्ता केवल 'चालान' काटने तक सीमित रहेगा या इन खूनी मोड़ों पर सुधार करेगा?

क्या राष्ट्रपति पुरस्कृत बेटी को इंसाफ मिलेगा, या रसूख के नीचे यह केस भी दब जाएगा?


पीडब्ल्यूडी के उन अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी, जिन्होंने 'डेंजर जोन' को खुला मौत का अड्डा छोड़ रखा है?

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