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"सेमरा (सी) में दीपों का जश्न — जहां बाकी दुनिया कर रही तैयारी, वहां पहले ही खिल उठी दीपावली की रोशनी!"


छत्तीसगढ़ का एक गांव — जो समय से आगे चलता है!

जहां देशभर में दीपावली की गिनती बाकी है, वहीं धमतरी जिले के सेमरा (सी) गांव में दीपों की कतारें पहले ही जगमगा उठी हैं।

यहां दीपावली का अर्थ सिर्फ रोशनी नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और देव आज्ञा का संगम है।

हर घर में दीप, हर आंगन में श्रद्धा, और हर चेहरे पर मुस्कान — यही है “सेमरा की दीपावली”, जो पूरे प्रदेश में अपनी अनूठी परंपरा से पहचान बना चुकी है।



दीपोत्सव की शुरुआत — गौरा जागरण से गूंजा गांव


सेमरा (सी) में दीपोत्सव की शुरुआत रातभर चले गौरा-जागरण और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना के साथ हुई।

पूरे गांव में दीयों की झिलमिलाहट और भक्ति गीतों की गूंज ने माहौल को दिव्य बना दिया।

गांव के हर द्वार पर दीपों की श्रृंखला, सजे हुए चौक-आंगन और पारंपरिक वेशभूषा में ग्रामीण — सब मिलकर “एक हफ्ता पहले दीपावली” की झलक पेश कर रहे हैं।


सांस्कृतिक रंगों में रमा सेमरा — छत्तीसगढ़ी नाचा की धूम


पर्व की रौनक को बढ़ाने के लिए ग्रामीणों ने दो दिवसीय छत्तीसगढ़ी नाचा महोत्सव रखा है।

14 अक्टूबर की रात “नवा किरण नाचा पार्टी, भंवरपुर (डोंगरगढ़)” अपनी प्रस्तुति से सबका मन मोह लेगी,

वहीं 15 अक्टूबर को “जय सूर्य नाचा पार्टी, रानीदहरा (कवर्धा)” की धमाकेदार प्रस्तुति गांव को थिरका देगी।

छत्तीसगढ़ी गानों और लोककला के बीच दीपोत्सव का यह संगम भक्ति और संस्कृति का अद्भुत मिलन है।



क्यों मनाते हैं पहले दीपावली — अनहोनी से जुड़ी लोक आस्था


सेमरा (सी) के सरपंच छबिलेश सिन्हा और ग्रामीण कामता निषाद, उमेश देवांगन, गजेंद्र सिन्हा बताते हैं कि गांव में दीपावली, हरेली, पोला और होली — चारों प्रमुख त्योहार एक सप्ताह पहले मनाने की परंपरा है।

यह परंपरा “सिरदार देव” की आराधना से शुरू होती है।

गांववालों का मानना है कि अगर सभी गांव एक साथ त्योहार मनाएं, तो अनहोनी या आपदा की संभावना रहती है।

इसी विश्वास के कारण यह परंपरा देव आदेश मानी जाती है — और कोई भी ग्रामीण इसे तोड़ने की हिम्मत नहीं करता।


कहा जाता है कि एक बार जब परंपरा तोड़ी गई थी, तब गांव में असामान्य घटनाएं हुई थीं।

तभी से यहां के लोग दृढ़ता से इसे निभाते आ रहे हैं — “पहले पूजा, फिर पर्व” यही सेमरा की पहचान है।


गोवर्धन पूजा और दीपोत्सव की परंपरा


14 अक्टूबर को मां लक्ष्मी की पूजा, 15 अक्टूबर को गोवर्धन पूजा और गौरा-गौरी की शोभायात्रा आयोजित की जाएगी।

इसके बाद गांव में सामूहिक भोज, आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होगा।

दिलचस्प यह है कि दीपावली मनाने के बाद भी ग्रामीण धनतेरस और नरक चतुर्दशी के दिन, जब पूरा देश दीप जलाता है, तब वे भी श्रद्धा से दीप प्रज्वलित करते हैं।


गांव की पहचान बनी अनूठी परंपरा


सेमरा (सी) गांव की यह परंपरा अब उसकी आस्था और अस्मिता का प्रतीक बन गई है।

यहां दीपावली केवल पर्व नहीं, बल्कि संस्कार और सामाजिक एकता का उत्सव है।

गांव के बच्चे, युवा और बुजुर्ग — सभी अपने रीति-रिवाजों पर गर्व महसूस करते हैं।


आज जब आधुनिकता के बीच परंपराएं धुंधला रही हैं,

सेमरा (सी) यह सिखाता है कि “परंपरा निभाना पिछड़ापन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ाव है।”

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