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Indian National Congress मुख्यालय ‘इंदिरा भवन’ में राष्ट्रीय विधिक संगोष्ठी–2026 संवैधानिक चुनौतियों पर मंथन, ओबीसी अधिकारों की रक्षा को नई रणनीति का संकेत


नई दिल्ली।

देश की लोकतांत्रिक आत्मा—संविधान—के सामने खड़ी चुनौतियों और उनके समाधान की दिशा तय करने के उद्देश्य से कांग्रेस मुख्यालय ‘इंदिरा भवन’ में ओबीसी कांग्रेस द्वारा “राष्ट्रीय विधिक संगोष्ठी–2026” का आयोजन किया गया। विषय था—‘संवैधानिक चुनौतियां: दृष्टिकोण और आगे की राह’।

कार्यक्रम में वरिष्ठ नेताओं, विधि विशेषज्ञों और सैकड़ों अधिवक्ताओं की उपस्थिति ने इसे महज़ एक संगोष्ठी नहीं, बल्कि वैचारिक संकल्प सम्मेलन का रूप दे दिया।

सचिन पायलट का संदेश: “संविधान की आत्मा को जीवित रखना हम सबकी जिम्मेदारी”

संगोष्ठी को संबोधित करते हुए Sachin Pilot ने कहा कि भारत का विधिक इतिहास केवल धाराओं और अनुच्छेदों का नहीं, बल्कि न्याय और मानवीय मूल्यों के संघर्ष का इतिहास है। उन्होंने अधिवक्ताओं की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज तक न्यायपालिका और बार ने अन्याय के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि कानून केवल किताबों तक सीमित न रहे, बल्कि आमजन के अधिकारों की रक्षा का जीवंत औज़ार बने—यही लोकतंत्र की असली कसौटी है।

ओबीसी अधिकारों पर केंद्रित विमर्श

ओबीसी विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनिल जयहिंद ने सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। राष्ट्रीय सचिव सुभाषिनी यादव, रोहित प्रताप, अम्बिका यादव और तेलंगाना प्रभारी व गिरीश देवांगन सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे।

प्रदेश अध्यक्ष केशव चंद्राकर सहित सैकड़ों अधिवक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि—

“अधिवक्ता व्यवस्था और आमजन के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। न्याय की पहुंच अंतिम व्यक्ति तक सुनिश्चित करना ही असली संवैधानिक प्रतिबद्धता है।”

जब मंच पर राष्ट्रीय समन्वयक पूर्व विधायक श्री लेखराम साहू माइक पर आए, तो उनके सधे हुए अंदाज और प्रखर तेवरों ने न केवल दिल्ली के दिग्गजों को चौंका दिया, बल्कि छत्तीसगढ़ के उन विरोधियों के माथे पर भी पसीना ला दिया जो उन्हें मुख्यधारा से बाहर मान रहे थे।

लेखराम साहू के वो प्रहार, जिससे मची है खलबली:

"कानून की रक्षक या सत्ता की कठपुतली?": साहू जी ने दो टूक कहा कि अधिवक्ता व्यवस्था की कड़ी हैं, पिछलग्गू नहीं। उन्होंने वकीलों से आह्वान किया कि अन्याय के खिलाफ वही 'आजादी वाला जुनून' लाएं, वरना इतिहास माफ नहीं करेगा।

संगोष्ठी की प्रमुख बातें

सामाजिक न्याय और आरक्षण नीति पर विधिक परिप्रेक्ष्य

संविधान की मूल भावना की रक्षा के लिए संस्थागत मजबूती

वंचित वर्गों के अधिकारों की सुरक्षा हेतु रणनीतिक पहल

न्यायिक प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाने की आवश्यकता

विशेषज्ञों ने कहा कि बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में संविधान के मूल ढांचे की रक्षा और समान अवसर की अवधारणा को बनाए रखना समय की मांग है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और वर्तमान संदर्भ

भारत का विधिक इतिहास न्याय के लिए सतत संघर्ष की कहानी रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से लेकर आज तक अधिवक्ताओं ने समाज को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संगोष्ठी में यह भी रेखांकित किया गया कि लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है जब न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन कायम रहे और संविधान सर्वोच्च बना रहे।

आगे की राह: संकल्प से क्रियान्वयन तक

संगोष्ठी का निष्कर्ष स्पष्ट था—

संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए विधिक जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे।

ओबीसी वर्ग के अधिकारों पर केंद्रित राष्ट्रीय स्तर की कानूनी कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी।

अधिवक्ताओं का एक सशक्त नेटवर्क तैयार किया जाएगा, जो जमीनी स्तर पर न्याय सुनिश्चित करने में सहयोग करेगा।


‘राष्ट्रीय विधिक संगोष्ठी–2026’ केवल एक बौद्धिक चर्चा नहीं थी, बल्कि यह संदेश था कि संविधान की आत्मा—समानता, न्याय और स्वतंत्रता—को बचाए रखना हर नागरिक और अधिवक्ता की साझा जिम्मेदारी है।

नई दिल्ली से उठी यह आवाज़ आने वाले समय में देशभर में विधिक और सामाजिक विमर्श को नई दिशा दे सकती है।

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