अब इलाज के लिए नहीं बिकेंगे कर्मचारियों के 'मंगलसूत्र' और 'जमीन'; साय सरकार का ₹100 करोड़ का मास्टरस्ट्रोक!
- moolchand sinha

- Feb 25
- 2 min read

रायपुर |
छत्तीसगढ़ के सरकारी गलियारों से एक ऐसी खबर आई है जिसने लाखों कर्मचारियों की आंखों में खुशी के आंसू ला दिए हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बजट में 'कैशलेस चिकित्सा सुविधा' का ऐलान कर उस 'काली प्रथा' का अंत कर दिया है, जिसमें एक कर्मचारी को अपनी जान बचाने के लिए जीवन भर की जमा-पूंजी दांव पर लगानी पड़ती थी।
वीरेंद्र बैस: वो आवाज जो 'सिस्टम' से टकराई और जीत ले आई
इस ऐतिहासिक जीत के महानायक बनकर उभरे हैं राजस्व पटवारी संघ के प्रांतीय प्रवक्ता वीरेंद्र बैस। जब-जब कर्मचारी हितों की बात आई, बैस की प्रखर शब्दावली और तर्कों ने सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा की। कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन के संयोजक कमल वर्मा के कुशल मार्गदर्शन में वीरेंद्र बैस ने इस मांग को 'जिंदा' रखा और आज परिणाम सबके सामने है।
"हमने अस्पतालों की दहलीज पर कर्मचारियों को पैसों के लिए गिड़गिड़ाते देखा है। यह 100 करोड़ का बजट उन स्वाभिमानी हाथों को मजबूत करेगा जो दिन-रात शासन की सेवा करते हैं। यह न्याय की जीत है।" > — वीरेंद्र बैस, प्रांतीय प्रवक्ता, राजस्व पटवारी संघ
खबर का गहराई से विश्लेषण: क्यों यह फैसला 'संजीवनी' है?
अब तक छत्तीसगढ़ में नियम था— 'पहले खर्च करो, फिर महीनों तक दफ्तरों के चक्कर काटो'। कई बार तो फाइल पास होने से पहले कर्मचारी दुनिया छोड़ देता था। लेकिन अब:
सीधा भुगतान: अस्पताल का बिल अब सरकार भरेगी, कर्मचारी की जेब पर बोझ 'जीरो' होगा।
तत्काल इलाज: पैसों के अभाव में अब ऑपरेशन या इलाज में देरी नहीं होगी।
आर्थिक सुरक्षा:
साहूकारों और कर्जों के जाल से प्रदेश के लाखों पटवारी और कर्मचारी मुक्त होंगे।
सियासी और सामाजिक गलियारों में हलचल
विष्णुदेव साय सरकार के इस 'संवेदनशील कदम' ने विपक्ष के पास भी बोलने का मौका नहीं छोड़ा है। प्रारंभिक चरण में 100 करोड़ रुपये का प्रावधान करना यह दर्शाता है कि यह केवल चुनावी वादा नहीं, बल्कि एक ठोस इच्छाशक्ति है। राजस्व पटवारी संघ ने इस निर्णय पर खुशी जताते हुए वीरेंद्र बैस के नेतृत्व में साय सरकार और कमल वर्मा का आभार व्यक्त किया है।
मुख्य हाइलाइट्स
बजट का धमाका: ₹100 करोड़ से कैशलेस इलाज की नींव।
किसे मिली राहत: छत्तीसगढ़ के समस्त राजपत्रित, अराजपत्रित और मैदानी कर्मचारी।
जीत का चेहरा: वीरेंद्र बैस (राजस्व पटवारी संघ) और कमल वर्मा (फेडरेशन)।
बड़ा बदलाव: रीइम्बर्समेंट की जटिल प्रक्रिया से हमेशा के लिए मुक्ति।



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