आंगन से गायब होती चहचहाहट को बचाने की ' पहल ', मोहन साहू ने पेश की मिसाल
- moolchand sinha

- Mar 7
- 2 min read

कुरूद (छत्तीसगढ़) :
आज के आधुनिक युग में जहाँ ऊँची इमारतें और मोबाइल टावर प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं, वहीं धमतरी जिले के राइस मिलर श्री मोहन साहू एक मसीहा बनकर उभरे हैं। शासकीय नवीन प्राथमिक शाला चर्रा में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में उन्होंने बच्चों को कृत्रिम घोंसले वितरित कर पर्यावरण संरक्षण का एक नया अध्याय शुरू किया है।
संकट में पर्यावरण: क्यों मौन हो रही है गौरैया?
वर्तमान समय में पर्यावरण असंतुलन 🌡️ एक वैश्विक चुनौती बन चुका है। कंक्रीट के जंगलों और बढ़ते प्रदूषण के कारण नन्हीं गौरैया के पास अब घोंसला बनाने के लिए सुरक्षित जगह नहीं बची है। वैज्ञानिकों का मानना है कि गौरैया का कम होना हमारे ईकोसिस्टम के लिए एक खतरे की घंटी है।
9 साल, 15000 घोंसले: एक अविश्वसनीय सफर
मोहन साहू जी पिछले 09 वर्षों से इस मिशन पर हैं। उन्होंने अब तक 15,000 से अधिक कृत्रिम घरों का वितरण किया है। उनका लक्ष्य स्पष्ट है—प्रकृति और मानव के बीच के टूटे हुए संपर्क को फिर से जोड़ना।
बच्चों के लिए 'प्रकृति की पाठशाला'
शाला परिसर में बच्चों को गौरैया के जीवन के बारे में रोचक और सटीक जानकारी दी गई:
सक्रिय जीवन: गौरैया एक अत्यंत सक्रिय और सामाजिक पक्षी है जो झुंड में रहना पसंद करती है। 🐦
आहार: यह कोमल कलियों और कीड़े-मकोड़ों को खाकर फसलों की रक्षा भी करती है।
प्रजनन: पुराने घरों के कोनों, फोटो फ्रेम या मानव निर्मित बक्सों में यह सुरक्षित महसूस करती है।
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सामुदायिक अपील और उपस्थिति
इस अवसर पर संकुल समन्वयक टांकेश्वर कुमार साहू, शिक्षक देवनाथ साहू, नरगिस परवीन और रेणुका देवांगन उपस्थित थे। शिक्षकों ने समुदाय से अपील की है कि वे इन घोंसलों का संरक्षण करें ताकि आने वाली पीढ़ी इस नन्हीं चिड़िया की चहचहाहट सुन सके।
"शाला परिवार मोहन साहू जी के इस निस्वार्थ कर्तव्य मार्ग की सफलता की कामना करता है।" — शाला प्रबंधन समिति


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