कुरुद की माटी में सात सालों का संकल्प: जब राम मंदिर की भव्यता और नगाड़ों की गूंज के बीच जीवंत हुई कला
- moolchand sinha

- 1 day ago
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कुरूद।
कल्पना कीजिए... एक तरफ 10 वर्षों से अटूट आस्था के साथ मनाया जा रहा प्राचीन राम मंदिर का भव्य 'वसंतोत्सव', जहाँ नगाड़ों की थाप आसमान गुंजा देती है। दूसरी तरफ, उसी गूँज के बीच पिछले 7 वर्षों से गांधी चौक पर मिट्टी को नया जीवन देते देश भर के दिग्गज शिल्पकार। यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि कुरुद की गलियों में बहती कला और भक्ति की एक 'सांस्कृतिक त्रिवेणी' है। हीरा सिरामिक फाउंडेशन और आयुष सेवा संस्थान के इस साझा 'सिरामिक उत्सव 2026' ने कुरुद को आज देश के कला मानचित्र पर एक चमकते सितारे की तरह स्थापित कर दिया है।
नगाड़ों की गूँज और चाक की सरसराहट: जब झूम उठी संस्कृति
उत्सव के पहले ही दिन का दृश्य किसी दैवीय अनुभव जैसा था। उत्सव का चरमोत्कर्ष तब देखने को मिला जब प्राचीन राम मंदिर परिसर में 10वें वसंतोत्सव के नगाड़े गूंजे और वहां मौजूद देश भर के कलाकार खुद को रोक नहीं पाए और जमकर थिरके। नगाड़ों की उस जादुई थाप और कलाकारों के नृत्य ने मंदिर प्रांगण में एक ऐसी ऊर्जा भर दी कि वहां मौजूद आम जन भी झूम उठे। उत्साह के बीच गांधी चौक पर मिट्टी ने भी नया आकार लेना शुरू किया, मानो संगीत और शिल्प एक-दूसरे में विलीन हो रहे हों।
तीन पीढ़ियों का हुनर: कुरुद में 'लघु भारत'
इस उत्सव में भारत की तीन पीढ़ियों के कलाकारों ने हिस्सा लेकर कुरुद को एक 'लघु भारत' बना दिया।
दिग्गज कलाकार: वडोदरा के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार कृष्ण पडिया के संयोजन ने इस कार्यशाला को नई ऊंचाई दी। उन्होंने अगले वर्ष इसे 'अंतरराष्ट्रीय स्तर' पर ले जाने का संकल्प लिया।
प्रमुख उपस्थिति: गुजरात से सुश्री खुशी पटेल, एमपी से दिव्या पोरवाल, और छत्तीसगढ़ के गौरव प्रो. शीबा प्रसाद चौधरी सहित मोहनलाल बराल, अनंत साहू, डॉ. छगेन्द्र उसेंडी और संदीप किंडो जैसे सितारों ने यहाँ सृजन का नया इतिहास लिखा।
'नगाड़ा उत्सव' - परंपरा को सलाम
इस कार्यशाला को "नगाड़ा उत्सव" का नाम इसलिए दिया गया ताकि कला के आधुनिक रूपों के बीच हमारी लोक-परंपराएं कहीं खो न जाएं। समापन समारोह के दौरान आयुष सेवा संस्थान के निदेशक अखिलेश वैष्णव ने कलाकारों की कृतियों को देखकर कहा कि यह मेहनत कुरुद के गौरव को सात समंदर पार ले जाएगी।
भविष्य की बड़ी तैयारी:
कुरुद के युवा नेता और स्वयं एक शिल्पकार रविकांत चंद्राकर ने इस उत्सव में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाते हुए एक क्रांतिकारी घोषणा की। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में सिरामिक के साथ-साथ पत्थर, धातु और लकड़ी के शिल्प की विशाल कार्यशालाएं भी आयोजित की जाएंगी, ताकि कुरुद हर प्रकार की शिल्प कला का केंद्र बन सके।



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