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कुरूद 2025: अजय चंद्राकर की 'विकास डॉक्युमेंट्री' और स्वर्णिम भविष्य का रोडमैप ​सपना अजय चंद्राकर का, संकल्प ज्योति भानु का—शिक्षा, स्वास्थ्य और आधुनिकता के संगम से रचा जा रहा है नया इतिहास!

कुरूद।

किसी क्षेत्र की प्रगति महज़ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी नेतृत्व द्वारा बुनी गई वह 'डॉक्युमेंट्री' है जिसे जनता अपनी आँखों से साकार होते देख रही है।साल 2026 की दहलीज पर खड़ा कुरूद आज अपनी तकदीर का नया पन्ना लिख रहा है। यह किसी सामान्य चुनावी प्रक्रिया का नतीजा नहीं, बल्कि वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर की उस 'विजन डॉक्युमेंट्री' का जीवंत चित्रण है, जिसे उन्होंने दशकों पहले मरुस्थल जैसे हालात से महानगर बनाने के लिए तैयार किया था। आज उसी खाके को नगर पालिका अध्यक्ष ज्योति भानु चंद्राकर ने अपने 10 'ब्रह्मास्त्रों' से हकीकत में बदल दिया है। लेकिन विकास की इस गूँज के बीच, विपक्ष का 'अनिश्चितकालीन आक्रोश' और 'भितरघात' कुरूद की सियासत में एक अलग ही कहानी बयां कर रहा है।

​ अजय चंद्राकर की 'विजन डॉक्युमेंट्री': बुनियादी सुविधाओं का स्वर्णिम युग

​विधायक अजय चंद्राकर का विजन हमेशा भविष्यवादी रहा। उन्होंने कुरूद को केवल एक कस्बा नहीं, बल्कि सुविधाओं से लैस एक आधुनिक केंद्र के रूप में देखा था। उनकी विकास डॉक्युमेंट्री के मुख्य स्तंभ आज क्षेत्र की पहचान बन चुके हैं:

शिक्षा और ज्ञान का केंद्र: जहाँ कभी शिक्षा के लिए शहरों की ओर ताकना पड़ता था, वहाँ आज पॉलिटेक्निक, एलएलबी और नर्सिंग कॉलेजों की कतार है।

स्वास्थ्य सेवा में मिसाल: 100 बिस्तरों का अत्याधुनिक अस्पताल आज हजारों लोगों की संजीवनी बन चुका है।

सड़क और पुल-पुलिया का जाल: 'पहुँच विहीन' क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सड़कों और दर्जनों पुल-पुलिया का निर्माण किया गया, जिसने व्यापार और आवागमन को नई गति दी।

सिंचाई और पेयजल: अन्नदाता किसानों के लिए सुदृढ़ सिंचाई व्यवस्था और हर घर तक शुद्ध पेयजल की पहुँच सुनिश्चित करना चंद्राकर के विजन का अहम हिस्सा रहा है।

बिजली और बुनियादी ढांचा: निर्बाध बिजली आपूर्ति और हर गली में रोशनी का प्रबंध कर कुरूद को 'अंधेरे से उजाले' की ओर ले जाने का संकल्प धरातल पर दिख रहा है।

​ ज्योति भानु चंद्राकर के 10 'ब्रह्मास्त्र': संकल्प से सिद्धि तक

​विकास की इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए अध्यक्ष ज्योति भानु चंद्राकर ने जिन योजनाओं को धरातल पर उतारा, वे आज प्रदेश के लिए मिसाल हैं:

महिला कमांडो (8 मार्च): सुरक्षा और स्वाभिमान का नया प्रतीक।

8 करोड़ का सौगात (31 मई): सुशासन दिवस पर विकास का मेगा-प्रहार।

नगर पालिका का 'सुपरफास्ट' दर्जा: मात्र 4 महीने में नगर पालिका का अस्तित्व में आना।

निर्माणाधीन पालिका महल: मंडी रोड पर 3.50 एकड़ में 2 करोड़ की लागत से भव्य भवन।

अतिक्रमण पर सर्जिकल स्ट्राइक: केनाल रोड और देवार डेरा से मुक्ति, बाजारों में नई रौनक।

पारदर्शिता का 'होम डिलीवरी' मॉडल: घर-घर नीलामी के आमंत्रण पत्र, बिचौलियों का अंत।

तीसरी आँख का पहरा: 45+ हाई-टेक सीसीटीवी कैमरों से चप्पे-चप्पे पर नजर।

स्पोर्ट्स हब: बायपास रोड पर नया इंडोर स्टेडियम और खेल अधोसंरचना का विस्तार।

अटल स्टेडियम उन्नयन: 5 करोड़ की लागत से खेलों का कायाकल्प।

कचरा प्रबंधन: 4 एकड़ का आधुनिक डंपिंग यार्ड और गंदगी से स्थाई मुक्ति।

​ सियासी 'क्लाइमैक्स': 17 दिन का धरना और 'चोरी' का शोर

​विकास के इस स्वर्णिम दौर में राजनीति का एक स्याह पक्ष भी कुरूद की सड़कों पर दिखा। जहाँ एक ओर विकास की दहाड़ है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष की आपसी कलह का सन्नाटा और प्रशासन के खिलाफ आक्रोश का अद्भुत मेल है:

17 दिनों का 'आर-पार': कांग्रेस पार्षदों ने 17 दिनों तक अनिश्चितकालीन धरना देकर प्रशासन को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। यह धरना महज़ विरोध नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता के खिलाफ एक सामूहिक आक्रोश बनकर उभरा।

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नगर पंचायत चुनाव और सियासत की तस्वीर : अपनों का खंजर

नगर पंचायत चुनाव में कांग्रेस को स्पष्ट जनाधार मिला, लेकिन उपाध्यक्ष चुनाव आते-आते सियासत की असली तस्वीर सामने आ गई। सार्वजनिक मंचों पर आरोपों और “चोरी” जैसे नारों की गूंज के बीच, कांग्रेस के ही कुछ पार्षदों ने अपने दल के खिलाफ मतदान कर दिया।

नतीजा यह हुआ कि कुरूद नगर पंचायत में उपाध्यक्ष का चुनाव बाहरी मुकाबले से नहीं, बल्कि अपनों के खंजर और अंदरूनी फूट के चलते तय हो गया—जिसने दलगत अनुशासन और कथनी-करनी के अंतर को उजागर कर दिया।

बिखरता किला: सार्वजनिक मंचों से लगे ये आरोप बताते हैं कि कांग्रेस आज केवल प्रशासन से नहीं, बल्कि अपनी ही आंतरिक 'सियासी भट्टी' में जल रही है।

कुरूद अब सिर्फ बदल नहीं रहा, बल्कि अपनी दिशा खुद तय कर रहा है। यहाँ 'संकल्प से सिद्धि' का मंत्र साकार हो रहा है। प्रशासन पर आरोप और राजनीति के अंतर्विरोधों के बीच, जनता का फैसला साफ है—उन्हें विकास की 'डॉक्युमेंट्री' चाहिए, सियासत की 'चोरी' नहीं।

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