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**कुरूद महिला खेलकूद प्रतियोगिता 2025 : रजत जयंती का जलवा… और 132 गांवों में से सिर्फ 35 की हाज़िरी! कागज़ों पर ‘रजत महोत्सव’, मैदान में ‘खामोशी’—जिला खेल अधिकारी सवालों के घेरे में**


कुरूद, धमतरी।

अटल बिहारी वाजपेयी स्टेडियम बुधवार को रजत जयंती के जश्न से सजा हुआ था—

25 साल की उपलब्धियों का दावा, चमचमाते मंच, सुंदर पंडाल, अतिथियों का गरिमामय आगमन…

सब कुछ वैसा जैसे किसी शान-ओ-शौकत भरे महोत्सव में होता है।


लेकिन जैसे ही नज़र मंच से हटकर मैदान की तरफ़ गई—

नज़रें ठिठक गईं।

रजत जयंती का मैदान… 132 गांवों में से सिर्फ 35 गांवों की बालिकाओं से सिमटा हुआ!


रजत जयंती का उत्सव था—

पर दृश्‍य ऐसा जैसे सोने की थाली में रोटी ही न हो।


◼ रजत जयंती… पर भागीदारी तांबे जैसी


25 साल पूरे होने पर यह आयोजन “खेलो इंडिया का मील का पत्थर” बताया गया था।

उम्मीद थी कि 132 गांवों का पूरा ब्लॉक उमड़ पड़ेगा,

पर हकीकत बेहद करारी निकली—

सिर्फ 35 गांव!

यह आंकड़ा रजत जयंती के माथे पर एक तेज़, चुभता हुआ सवालिया निशान छोड़ जाता है।


रजत जयंती तो मनाई गई,

लेकिन भागीदारी देखकर लगा जैसे विभाग ने इस उत्सव को

“सिर्फ रस्म” मान लिया हो।




◼ जिला खेल अधिकारी—रजत जयंती के नाम पर ‘रुटीन’ मोड?


इतनी बड़ी संख्या में गांवों का गैर-हाज़िर रहना कोई संयोग नहीं।

या तो सूचना ठीक से नहीं पहुंचाई गई,

या फिर विभाग ने “25 साल” के नाम पर अपनी जिम्मेदारी को

औपचारिकता की चादर ओढ़ा दी।


रजत जयंती का अर्थ है—

25 वर्षों की परंपरा, विश्वास और निरंतरता।

पर यहां भरोसा टूटा… और मैदान की खामोशी ने उस टूटन को खूब उजागर किया।



◼ कुछ गांव पहुंचे—तो रजत जयंती की लाज बची


सिंधोरी खुर्द, मंदरौद, कातलबोड़, गोबरा, जामगांव, गुदगुदा जैसे गांवों की बालिकाओं ने खो-खो, बैडमिंटन, वॉलीबॉल, कुश्ती, एथलेटिक्स जैसे खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन कर रजत जयंती की गरिमा बचाई।

लेकिन 97 गांवों का गायब रहना बताता है—

हुनर है, उम्मीद है… लेकिन व्यवस्था का इकबाल कमजोर है।


◼ मंच पर रजत जयंती का गौरव—मैदान में सन्नाटा


मुख्य अतिथि भोजराज चंद्राकर ने प्रेरक संदेश दिया—

“खेलोगे-कूदोगे तो बनोगे नवाब।”

बात असरदार…

लेकिन सवाल वही—

97 गांवों की गैरमौजूदगी पर नवाबी का सपना किसे दिखाया जाएगा?


व्यायाम शिक्षकों की मेहनत काबिल-ए-तारीफ थी,

पर रजत जयंती के आयोजन का भार सिर्फ शिक्षकों पर डालकर

प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी हल्की जरूर कर ली—

लेकिन मैदान ने इस ‘हल्केपन’ को पकड़ लिया।



रजत जयंती पर उठते सबसे कड़े सवाल—


➡ क्या 25 वर्षों की प्रतियोगिता की यह हालिया तस्वीर व्यवस्था का दयनीय ‘जुबली-रिपोर्ट कार्ड’ नहीं?

➡ क्या जिला खेल अधिकारी ने रजत जयंती की गरिमा के अनुरूप अपनी भूमिका निभाई?

➡ क्या महिला खेल सशक्तिकरण सिर्फ मंच की लाईटों तक सीमित है?

➡ और सबसे बड़ा सवाल—

क्या 97 गांवों का मौन रजत जयंती का सबसे बड़ा व्यंग्य नहीं?



अंत में—कुरूद की मिट्टी की आवाज़


“25 साल का सफर है,

उपलब्धियों की चमक है…

लेकिन मैदान का सन्नाटा बताता है—

चांदी की जयंती, पर काम तांबे जैसा।”


रजत जयंती का मंच भले चमक उठा हो,

मगर मैदान की खाली जगहों ने बता दिया—

सच्चे जश्न की पहचान रोशनी से नहीं, भागीदारी से होती है।


और इस बार…

भागीदारी ने रजत जयंती के चेहरे पर एक कड़वा, चुभता हुआ व्यंग्य छोड़ दिया।

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