गुरु-शिष्य मिलन: पचपेड़ी स्कूल में उमड़ा यादों का सैलाब, 34 सालों का सफर एक मंच पर हुआ जीवंत
- moolchand sinha

- Jan 11
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धमतरी | राजेश रात्रे
वक्त की धूल जमी यादों की किताबों के पन्ने जब शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला पचपेड़ी के प्रांगण में खुले, तो हर चेहरा खिल उठा। अवसर था 'शिक्षक-छात्र सम्मेलन' का, जहाँ सन 1991 से लेकर 2025 तक के तीन दशकों का इतिहास एक ही पांडाल के नीचे सिमट आया। कलेक्टर अविनाश मिश्रा की संकल्पना को साकार करते हुए इस आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि ओहदे बदलते हैं, उम्र बढ़ती है, लेकिन 'गुरु' और 'शाला' के प्रति समर्पण कभी कम नहीं होता।
भावुक मिलन: जब सफलताओं ने गुरु के चरणों में झुकाया शीश
समारोह का दृश्य किसी उत्सव से कम नहीं था। कोई छात्र अब पुलिस की वर्दी में था, तो कोई डॉक्टर बनकर समाज सेवा कर रहा था, लेकिन जैसे ही उन्होंने अपने पुराने शिक्षकों (पूर्व प्राचार्य एच.एस.साहू, सी.एच.साहू, पी.आर.साहू व अन्य) को देखा, वे फिर से वही 'अनुशासित विद्यार्थी' बन गए। वर्षों बाद हुए इस 'हृदय मिलन' ने पुरानी शरारतों, क्लास की बेंच और गुरुओं की डांट-फटकार की मीठी यादों को पुनर्जीवित कर दिया।
अनुभवों का कारवां: अभावों से ऊंचाइयों तक का सफर
मंच से जब पूर्व प्राचार्य एच.एस.साहू ने संबोधन शुरू किया, तो सन्नाटा पसर गया। उन्होंने अपनी स्मृतियों के झरोखे से साझा किया:
"हमने शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है। 1991 में जब सुविधाओं का अकाल था, तब शाला विकास समिति और छात्रों के अटूट विश्वास ने इस संस्था को सींचा। आज मेरे शिष्यों की सफलता ही मेरी असली गुरुदक्षिणा है।"
सम्मान का शिलालेख: हर बैच की अपनी एक गाथा
यह आयोजन मात्र एक मिलन नहीं, बल्कि सफलता का सम्मान था। 1991 से लेकर वर्तमान तक के हर बैच के प्रतिनिधियों को जब 'स्मृति चिन्ह' प्रदान किया गया, तो उनकी आँखों में अपने स्कूल के प्रति कृतज्ञता साफ़ झलक रही थी। पूर्व शिक्षकों ने स्पष्ट संदेश दिया कि— "शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल जीविकोपार्जन (नौकरी) नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ मनुष्य का निर्माण करना है।"
अनुशासन की पाठशाला में पुनः वापसी
विद्यालय की गरिमामयी प्रार्थना से शुरू हुए इस कार्यक्रम में वर्तमान प्राचार्य विनोद ठाकुर और उनकी टीम (चंद्रहास साहू, मिथलेश साहू, एस.के.निषाद व अन्य) ने आतिथ्य की अद्भुत मिसाल पेश की। आर.सी.पटेल, बी.आर.कोसरिया और एन.सहारे जैसे दिग्गज गुरुजनों की मौजूदगी ने कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिए।
सार-संक्षेप:
यह सम्मेलन केवल पूर्व छात्रों का जमावड़ा नहीं था, बल्कि यह 'संस्कारों का पुनरावलोकन' था। पचपेड़ी की माटी से निकले ये सितारे आज भले ही देश के अलग-अलग कोनों में चमक रहे हों, लेकिन उनकी चमक की चमक आज भी इसी स्कूल के अनुशासन और गुरुओं के आशीर्वाद में निहित है।








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