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छत्तीसगढ़ में 'सफेदपोश' अपराध का खौफनाक कॉकटेल; जुए की नाल से अफीम की क्यारियों तक


धमतरी/रायपुर:

छत्तीसगढ़ के शांत खेतों की आबो-हवा बदल रही है। जहाँ कल तक फसलों की महक थी, वहां अब ताश के पत्तों की गड़गड़ाहट और अफीम की मादक गंध घुलने लगी है। भखारा (कुरुद) के सुनसान खेतों में चल रहा जुए का 'हाई-टेक' खेल हो या दुर्ग-बलरामपुर में पकड़ी गई अफीम की खेती, ये महज इत्तेफाक नहीं बल्कि एक संगठित सिंडिकेट के बढ़ते कदम हैं।

भखारा का 'ब्लूटूथ' जुआ: खाकी को ठेंगा दिखाता सिंडिकेट

कुरुद के भखारा क्षेत्र में जुआ अब शौक नहीं, एक व्यवस्थित उद्योग बन चुका है। रामपुर की नहरें हों या कोसमर्रा और देवरी के खेत, यहाँ 'सिंघम' वाली पुलिसिया कार्रवाई केवल कागजों और सायरन तक सिमट गई है।

मिस्टर इंडिया फड़:

ग्रामीणों के बीच चर्चा है कि पुलिस और जुआरियों के बीच कोई गुप्त 'ब्लूटूथ' कनेक्शन है। साहबों की गाड़ी पहुंचने से पहले ही फड़ गायब हो जाता है। मौके पर मिलती है तो सिर्फ खाली डिस्पोजल और बीड़ी की राख।

फाइनेंस का मकड़जाल:

धमतरी और भिलाई के सफेदपोश फाइनेंसर मौके पर मौजूद रहकर 10% दैनिक ब्याज पर कर्ज बांट रहे हैं। यानी जुआरी भले उजड़ जाए, सिंडिकेट की तिजोरी भरनी चाहिए। रोजाना 1 से 2 लाख रुपये की 'नाल' (कमीशन) डकारी जा रही है।

खतरे की नई दस्तक: अफीम की 'अवैध' पैदावार

जुआ तो सिर्फ ट्रेलर है, असली फिल्म 'नशे की खेती' के रूप में प्रदेश के भविष्य को निगलने को तैयार है। हालिया घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट मोड पर डाल दिया है:

दुर्ग (समोदा): एक रसूखदार फार्महाउस में अफीम की खेती का पकड़ा जाना बताता है कि सफेदपोशों के संरक्षण में नशे का कारोबार जड़ें जमा चुका है।

बलरामपुर (कुसमी): सरहद से सटे इलाकों में अफीम की क्यारियाँ मिलना एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश की ओर इशारा करती हैं।


जनप्रतिनिधि अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। मामला जल्द ही एसपी (SP) की चौखट पर होगा। सवाल वही है—क्या महकमे के भीतर बैठे 'विभीषण' बेनकाब होंगे?

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