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छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग में 'तालमेल का अकाल': ऊपर जंग, नीचे छात्र-शिक्षक दंग

कुरूद : 

प्रदेश के शिक्षा विभाग में इन दिनों 'दाएं हाथ को नहीं पता कि बायां हाथ क्या कर रहा है' वाली स्थिति निर्मित हो गई है। माध्यमिक शिक्षा मंडल (माशिमं) और लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) के बीच आपसी तालमेल का ऐसा अकाल पड़ा है कि विभाग के दो शीर्ष संस्थानों ने स्कूलों को कुरुक्षेत्र बना दिया है। इनके परस्पर विरोधी और अव्यावहारिक निर्देशों ने प्रदेश की सुव्यवस्थित स्कूली शिक्षा को पटरी से उतार दिया है, जिसका सीधा खामियाजा लाखों छात्र मानसिक तनाव के रूप में और शिक्षक कार्य के भारी दबाव के रूप में भुगत रहे हैं।

​तालमेल का अभाव: जब दो मुखिया, दो अलग राहें

​शिक्षा विभाग के गलियारों में समन्वय की कमी का यह आलम है कि एक ही समय सीमा में दो अलग-अलग महत्वपूर्ण परीक्षाएं थोप दी गई हैं।

एक तरफ माशिमं: जिसने 1 से 20 जनवरी तक 10वीं-12वीं की प्रायोगिक (Practical) परीक्षाएं और प्रोजेक्ट कार्य निपटाने का डंडा घुमाया है।

दूसरी तरफ DPI: जिसने इसी बीच 15 जनवरी तक 'प्री-बोर्ड' परीक्षाएं आयोजित करने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया है।

​प्रशासनिक स्तर पर इस 'ईगो क्लैश' या समन्वय की कमी ने स्कूलों में अराजकता फैला दी है। छात्र इस उहापोह में हैं कि वे प्रयोगशाला में प्रैक्टिकल फाइल सजाएं या परीक्षा हॉल में बैठकर प्री-बोर्ड के पर्चे हल करें?

​"छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ बंद हो" - राजेंद्र चंद्राकर

​छत्तीसगढ़ तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ के जिला संरक्षक श्री राजेंद्र चंद्राकर ने इस अराजकता पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा, "यह पूरी तरह से प्रशासनिक संवेदनहीनता है। क्या एयरकंडीशन कमरों में बैठने वाले अधिकारियों को अंदाजा भी है कि एक ही समय में दो बड़ी परीक्षाओं का बोझ छात्र के कोमल मस्तिष्क पर क्या असर डालेगा? शिक्षकों के लिए एक ही समय में लैब और परीक्षा हॉल दोनों जगह ड्यूटी करना नामुमकिन है। यह व्यवस्था सुधार नहीं, बल्कि व्यवस्था का कत्ल है।"

​विद्यार्थियों और शिक्षकों पर पड़ने वाला घातक प्रभाव:

छात्रों पर मानसिक प्रहार: बोर्ड परीक्षा से ठीक पहले छात्रों को 'दोहरी मार' झेलनी पड़ रही है। इससे उनका आत्मविश्वास डगमगा रहा है और वे गंभीर मानसिक तनाव (Exam Stress) का शिकार हो रहे हैं।

शिक्षकों पर कार्यभार का पहाड़: एक ही तिथि पर प्रैक्टिकल के लिए बाहरी परीक्षकों का प्रबंधन और उसी समय प्री-बोर्ड परीक्षाओं का संचालन शिक्षकों के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से थकाने वाला साबित हो रहा है।

गुणवत्ता का ह्रास: जब परीक्षाएं केवल 'खानापूर्ति' बनकर रह जाएं, तो शिक्षा की गुणवत्ता का गिरना तय है। जल्दबाजी में न तो प्रैक्टिकल ठीक से होंगे और न ही प्री-बोर्ड का उद्देश्य सफल होगा।

​संघ का अल्टीमेटम: 'अब संवाद नहीं, समाधान चाहिए'

​तहसील अध्यक्ष श्री राजेश पाण्डेय सहित वर्षा केला, अविनाश साहू और अन्य पदाधिकारियों ने दोटूक कहा है कि यदि 24 घंटे के भीतर समय-सारणी में संशोधन कर सामंजस्य नहीं बिठाया गया, तो कर्मचारी संघ सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होगा।

संघ की स्पष्ट मांग:

​दोनों परीक्षाओं के बीच कम से कम 10 दिनों का स्पष्ट अंतराल हो।


​प्रायोगिक परीक्षाओं की अवधि को आगे बढ़ाया जाए ताकि छात्र प्री-बोर्ड पर एकाग्र हो सकें।


​भविष्य में ऐसी विसंगतियों को रोकने के लिए 'एकल कमान' समन्वय समिति बने।


छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग के ये विरोधाभासी निर्देश 'बिना तैयारी की गई छापेमारी' जैसे लग रहे हैं। यदि समय रहते शीर्ष नेतृत्व ने अपनी भूल नहीं सुधारी, तो इस साल के बोर्ड परीक्षा परिणाम विभाग की कार्यशैली की पोल खोल देंगे। अब गेंद शासन के पाले में है—वे छात्र हित चुनते हैं या प्रशासनिक हठधर्मिता?

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