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पद्मश्री सम्मान: बस्तर की 'बड़ी दीदी' – बारूद के ढेर पर बैठकर जिन्होंने लिखी उम्मीद की नई इबारत

रायपुर/बस्तर |

छत्तीसगढ़ का बस्तर... एक ऐसा नाम जो दशकों से राष्ट्रीय पटल पर नक्सली हिंसा, बारूदी सुरंगों और लाल आतंक के पर्याय के रूप में गूंजता रहा है। लेकिन, इसी अशांत भूगोल के बीच, अबूझमाड़ के घने जंगलों में एक महिला ने पिछले 40 वर्षों से खामोशी के साथ 'सेवा की समानांतर सरकार' चला रखी है।

​भारत सरकार ने बस्तर की इसी 'योद्धा' – बुधरी ताती – को देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान के लिए चुना है। अबूझमाड़ के घने जंगलों में जहाँ सूरज की किरणें भी मुश्किल से पहुँचती हैं, वहाँ बुधरी ताती ने शिक्षा और सेवा की ऐसी अलख जगाई है, जिसकी रोशनी आज दिल्ली तक पहुँच गई है।

​क्यों खास है बुधरी ताती का संघर्ष?

​गूगल मैप पर शायद आपको वो रास्ते न मिलें, जिन पर चलकर बुधरी ताती ने हजारों जिंदगियां बदली हैं। 'बड़ी दीदी' के नाम से मशहूर बुधरी जी की कहानी किसी सिनेमाई पटकथा से कम नहीं है, लेकिन यह हकीकत की उस ज़मीन पर लिखी गई है जो बेहद कठोर है।

खौफ के साये में शिक्षा: 40 साल पहले, जब बस्तर में नक्सलवाद अपनी जड़ें जमा रहा था, तब बुधरी ताती बच्चियों को स्कूल भेजने की मुहिम चला रही थीं। उन्होंने उस दौर में आदिवासी बेटियों के हाथों में किताबें थमाईं, जब उनके हाथों में हथियार थमाने की कोशिशें हो रही थीं।

समाज का सहारा: उनका काम सिर्फ स्कूल तक सीमित नहीं रहा। जिन बुजुर्गों को अपनों ने या हालातों ने छोड़ दिया, उनके लिए बुधरी ताती बुढ़ापे की लाठी बनीं।

​'अबूझमाड़' में बदलाव की आहट

​बुधरी ताती को पद्मश्री मिलना केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि 'अबूझमाड़' (जिसे बुझा न जा सके) की पहेली अब सुलझ रही है।

​विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सम्मान बस्तर की 'सॉफ्ट पावर' (Soft Power) को मान्यता देता है। अब तक दुनिया बस्तर को लाल आतंक के चश्मे से देखती थी, लेकिन बुधरी ताती ने दिखाया कि यहाँ की असली पहचान 'लाल आतंक' नहीं, बल्कि 'सेवा का श्वेत रंग' है। उन्होंने आदिवासी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर यह साबित किया कि बंदूक की नली से निकली शक्ति क्षणिक होती है, लेकिन आर्थिक और सामाजिक सशक्तीकरण स्थायी होता है।

​छत्तीसगढ़ का गौरव: एक ऐतिहासिक पल

​इस घोषणा के बाद पूरे छत्तीसगढ़ में गर्व का माहौल है। यह सम्मान राज्य की जनजातीय संस्कृति, उनके अदम्य साहस और सामुदायिक सेवा की भावना का उत्सव है। बुधरी ताती ने साबित कर दिया है कि अगर हौसला हो, तो सीमित संसाधनों में भी समाज की दिशा बदली जा सकती है।

​आज जब बुधरी ताती का नाम पद्म पुरस्कारों की सूची में चमक रहा है, तो यह बस्तर के हर उस नागरिक का सम्मान है जिसने हिंसा के बीच शांति का रास्ता चुना है। 'बड़ी दीदी' की यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक 'लाइटहाउस' का काम करेगी।

 
 
 

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