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प्रबंधन का 'यू-टर्न': बिजली कर्मियों की जेब पर लटकी तलवार हटी, सोलर पैनल की 'जिद' पर भारी पड़ा महासंघ का तर्क

 छत्तीसगढ़ बिजली कर्मचारी संघ-महासंघ का प्रतिनिधिमंडल प्रबंधन के अधिकारियों के साथ। सोलर पैनल की अनिवार्यता को लेकर महासंघ ने प्रबंधन के समक्ष अपना विरोध दर्ज कराया था, जिसके बाद यह राहत मिली है।
छत्तीसगढ़ बिजली कर्मचारी संघ-महासंघ का प्रतिनिधिमंडल प्रबंधन के अधिकारियों के साथ। सोलर पैनल की अनिवार्यता को लेकर महासंघ ने प्रबंधन के समक्ष अपना विरोध दर्ज कराया था, जिसके बाद यह राहत मिली है।

रायपुर/धमतरी | जब नीतियां धरातल की हकीकत से दूर एसी कमरों में बैठकर बनाई जाती हैं, तो उन्हें व्यवहारिकता की दीवार से टकराकर वापस लौटना ही पड़ता है। छत्तीसगढ़ विद्युत वितरण कंपनी (CSPDCL) के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। अगस्त 2025 में कंपनी प्रबंधन द्वारा जारी किया गया वह आदेश, जिसे कर्मचारी संगठन 'तुगलकी फरमान' कह रहे थे, आखिरकार वापस ले लिया गया है। 'नो सोलर, नो डिस्काउंट' की नीति पर प्रबंधन को झुकना पड़ा है और भारतीय मजदूर संघ से संबद्ध 'महासंघ' ने इसे तर्कों के दम पर जीती गई लड़ाई करार दिया है।

क्या था पूरा विवाद?

अगस्त 2025 में, प्रधानमंत्री सूर्यघर योजना को बढ़ावा देने के उत्साह में विद्युत कंपनी प्रबंधन ने एक तरफा आदेश जारी कर दिया। आदेश साफ था— "सभी अधिकारी-कर्मचारी अपने सरकारी या निजी आवास पर रूफटॉप सोलर पैनल लगवाएं, अन्यथा बिजली बिल में मिलने वाला 50 प्रतिशत फ्रिंज बेनिफिट (रियायत) तुरंत प्रभाव से बंद कर दिया जाएगा।"

​इस आदेश ने उन हजारों कर्मचारियों को संकट में डाल दिया जो या तो किराए के मकान में रहते थे, या विभागीय क्वार्टर में, जहाँ छत पर उनका कोई अधिकार नहीं था।

महासंघ का 'सर्जिकल स्ट्राइक' और प्रबंधन की बैकफुट

छत्तीसगढ़ बिजली कर्मचारी संघ-महासंघ ने इस आदेश के खिलाफ मोर्चा खोला। महासंघ ने प्रबंधन से स्पष्ट सवाल किया— "जिस कर्मचारी के पास अपनी छत ही नहीं है, वह सोलर पैनल हवा में कैसे लगाएगा?"

​लगातार पत्राचार और तीखे विरोध के बाद, प्रबंधन को अपनी गलती का अहसास हुआ। आज दिनांक 15 जनवरी 2026 को जारी नए आदेश में प्रबंधन ने अपनी जिद छोड़ दी है।

अब इन्हें मिलेगी बिना शर्त राहत (घोषणा पत्र के आधार पर):

नए आदेश के मुताबिक, अब सोलर पैनल लगवाना अनिवार्य नहीं होगा, यदि कर्मचारी निम्नलिखित श्रेणियों में आते हैं:

  • ​जिनका स्वयं का मकान नहीं है।

  • ​जो कंपनी द्वारा आवंटित विभागीय क्वार्टर में निवासरत हैं।

  • ​जिनके आवास की छत तकनीकी रूप से सोलर पैनल के लिए उपयुक्त नहीं है (छांव आदि की समस्या)।

  • ​जिनके नाम से विद्युत कनेक्शन नहीं है।

​ऐसे कर्मचारियों को केवल एक 'घोषणा पत्र' (Declaration) देना होगा और उनकी बंद की गई 50% बिजली बिल छूट फिर से बहाल कर दी जाएगी।

महासंघ का अगला वार: "प्रोत्साहन चाहिए, दबाव नहीं"

महासंघ के पदाधिकारियों ने इसे कर्मचारियों की जीत बताया है, लेकिन लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। महासंघ ने अब गेंद प्रबंधन के पाले में डालते हुए मांग की है कि:

​जिन कर्मचारियों का फ्रिंज बेनिफिट पिछले महीनों में काटा गया है, उसे एरियर के साथ वापस दिया जाए।

​यदि कंपनी चाहती है कि कर्मचारी सोलर पैनल लगाएं, तो इसका पूरा खर्च कंपनी प्रबंधन वहन करे और इसे 'बाध्यता' के बजाय 'प्रोत्साहन' के रूप में लागू करे।

यह घटनाक्रम साबित करता है कि प्रशासनिक आदेशों में लोच और व्यवहारिकता का होना कितना आवश्यक है। फिलहाल, बिजली कर्मियों के लिए यह मकर संक्रांति के बाद मिली एक बड़ी राहत है।

एडिटर की कलम से :

"बिजली बनाने और बांटने वालों के ही घर में अंधेरा करने की तैयारी थी, जिसे संगठन की एकजुटता ने नाकाम कर दिया। यह खबर सिर्फ एक आदेश वापसी की नहीं, बल्कि तार्किक विरोध की जीत की है।"

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