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बंदूक छोड़ी, मुख्यधारा को चुना: धमतरी में लाल आतंक को तगड़ा झटका, 5 लाख की इनामी कमांडर का सरेंडर

धमतरी (छत्तीसगढ़) | 06 जनवरी 2026

​छत्तीसगढ़ के लाल गलियारों में 'भूमिका' का नाम सुनते ही कभी सन्नाटा पसर जाता था। जिस महिला ने दो दशक तक घने जंगलों को अपना ठिकाना बनाया, 8 से ज्यादा भीषण मुठभेड़ों का नेतृत्व किया और जिसके सिर पर सरकार ने 5 लाख रुपये का इनाम रखा था, उसने आज लोकतंत्र के सामने अपना सिर झुका दिया है। धमतरी एसपी कार्यालय में हुआ यह आत्मसमर्पण केवल एक नक्सली की घर वापसी नहीं है, बल्कि माओवाद के ढहते साम्राज्य की एक बड़ी तस्वीर है।

"सलाम उन हाथों को जिन्होंने बारूद छोड़ तिरंगा चुना"

​बीजापुर की रहने वाली 37 वर्षीय भूमिका उर्फ गीता उर्फ लता... यह सिर्फ नाम नहीं, बल्कि धमतरी और ओडिशा की सीमाओं पर आतंक का दूसरा नाम था। साल 2005 में जब उसने माओवादी संगठन का दामन थामा था, तब उसे भी नहीं पता था कि उसका सफर सुरक्षा गार्ड से शुरू होकर 'गोबरा एलओएस कमांडर' तक पहुंचेगा। लेकिन आज, धमतरी पुलिस अधीक्षक श्री सूरज सिंह परिहार के एक छोटे से आह्वान और 'पुनर्वास नीति' के जादू ने उसे अपनी राह बदलने पर मजबूर कर दिया।

आतंक के 7,300 दिन और बारूद की गंध

​भूमिका का नक्सली सफर किसी रोंगटे खड़े कर देने वाली थ्रिलर फिल्म की तरह है।

सुरक्षा गार्ड से कमांडर तक का सफर:

भूमिका की काबिलियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह 2011 से 2019 तक सीसीएम संग्राम (सेंट्रल कमेटी मेंबर) की पर्सनल सुरक्षा गार्ड रही। यह पद संगठन में केवल सबसे भरोसेमंद लड़ाकों को दिया जाता है। इसके बाद वह ओडिशा के सीनापाली एरिया कमेटी में एसीएम और सितंबर 2023 में गोबरा एलओएस की 'कमांडर' बनी।

वो खूनी मुठभेड़ें जिनका वो हिस्सा रही:

पड़कीपाली का नरसंहार (2010): महासमुंद के पास हुई इस मुठभेड़ में 8 नक्सलियों की लाशें गिरी थीं। भूमिका उस वक्त मौत के साये से बच निकली थी।

तिमेनार की जंग (2018): बीजापुर के जंगलों में जब 8 नक्सली मारे गए, तब भी भूमिका पुलिस के घेरे को तोड़कर भागने में सफल रही थी।

धमतरी का मांदागिरी (2025): हाल ही में हुई इस मुठभेड़ के बाद पुलिस के लगातार बढ़ते दबाव ने उसे मानसिक रूप से तोड़ दिया।

एक्सक्लूसिव खुलासा: "संगठन में दम घुटता था..."

​आत्मसमर्पण के बाद भूमिका ने पुलिस के सामने जो राज उगले, वे चौंकाने वाले हैं। उसने बताया कि नक्सलवाद अब वह 'क्रांति' नहीं रही जिसका सपना दिखाया गया था।

भेदभाव का शिकार: बड़े कैडर के नेताओं की विलासिता और निचले स्तर के कैडरों (विशेषकर महिलाओं) के साथ होने वाला बुरा व्यवहार।

पारिवारिक सुख पर पाबंदी: संगठन में शादी और बच्चों की अनुमति न होना और अपनों से दूर रहने का दर्द।

पुलिस का 'हृदय परिवर्तन' अभियान: धमतरी पुलिस द्वारा जंगलों में बांटे गए पर्चे और पोस्टरों ने उसे यह अहसास कराया कि सरकार उसे मारना नहीं, बल्कि बचाना चाहती है।

धमतरी पुलिस की 'मास्टरस्ट्रोक' रणनीति

​एसपी सूरज सिंह परिहार और एएसपी शैलेंद्र कुमार पांडेय की टीम ने पिछले कुछ महीनों में नक्सलियों के खिलाफ 'दोहरी रणनीति' अपनाई है। एक तरफ ऑपरेशन दबाव और दूसरी तरफ सिविक एक्शन प्रोग्राम। पुलिस ने जंगलों में रहने वाले ग्रामीणों के जरिए नक्सलियों तक यह संदेश पहुंचाया कि 'लौट आओ, समाज तुम्हारा इंतजार कर रहा है'।

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