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भालूझुलन फूड पार्क विवाद: 45 दिनों से धूप में डटे ग्रामीण, क्या प्रशासन सुनेगा गुहार?


अपनी निस्तारी जमीन बचाने के लिए 45 दिनों से धूप में तपते 'अन्नदाता'।
अपनी निस्तारी जमीन बचाने के लिए 45 दिनों से धूप में तपते 'अन्नदाता'।

धमतरी (कुरूद)।

विकास की परिभाषा जब कागजों से निकलकर जमीन पर उतरती है, तो अक्सर वह उन लोगों के पैरों तले की जमीन खिसका देती है जो सदियों से वहां बसे हैं। कुरूद तहसील के ग्राम पंचायत कन्हारपुरी का आश्रित ग्राम भालूझुलन फूड पार्क विवाद आज इसी विडंबना का जीवंत उदाहरण बन गया है। शासन जिसे 'औद्योगिक क्रांति' कह रहा है, ग्रामीण उसे अपने अस्तित्व पर 'प्रहार' मान रहे हैं। 27 एकड़ की सार्वजनिक भूमि पर 39 उद्योगों की स्थापना का प्रशासनिक पेंच अब ग्रामीणों के सब्र का बांध तोड़ चुका है।

आखिर क्यों बढ़ता जा रहा है भालूझुलन फूड पार्क विवाद?

पिछले 45 दिनों से भालूझुलन के ग्रामीण बारी-बारी से धरने पर बैठकर उन अधिकारियों की राह ताक रहे हैं, जिन्होंने 15 फरवरी को वार्ता का आश्वासन दिया था। हाल ही में जब उद्योग विभाग और भारी पुलिस बल सीमांकन (मार्किंग) करने पहुंचा, तो ग्रामीणों का आक्रोश फूट पड़ा। घंटों कड़ी धूप में पेड़ों के नीचे बैठे ग्रामीणों की बस एक ही पुकार थी— "संवाद चाहिए, तानाशाही नहीं।"

हैरानी की बात यह है कि मौके पर पुलिस बल तो मुस्तैद था, लेकिन ग्रामीणों के 8 सूत्रीय सवालों का जवाब देने वाला कोई जिम्मेदार अधिकारी नजर नहीं आया। डेढ़ साल से जिला प्रशासन के चक्कर काट रहे इन आदिवासियों की सुनवाई अब तक 'फाइलों के जाल' में उलझी हुई है।

नीति बनाम नियत: 'गोधन' की बात और चारागाह पर 'घात'

उद्योगों की चहारदीवारी में कैद होने की कगार पर गांव का एकमात्र 'पानी' और 'चारागाह'।
उद्योगों की चहारदीवारी में कैद होने की कगार पर गांव का एकमात्र 'पानी' और 'चारागाह'।

एक तरफ सरकार 'नरवा, गरवा, घुरवा, बारी' के जरिए छत्तीसगढ़ी संस्कृति और पशुपालन को सहेजने का दम भरती है, वहीं भालूझुलन में हकीकत इसके उलट है।

ग्रामीणों की 8 प्रमुख मांगें, जो बनीं संघर्ष की वजह:

बेजुबानों का निवाला: गांव के 800 मवेशियों और 400 बकरियों के लिए चारागाह भूमि सुनिश्चित की जाए।

आदिवासी स्वाभिमान: 60% आदिवासी आबादी की आजीविका (पशुपालन) को संरक्षित किया जाए।

बुनियादी ढांचा: युवाओं के लिए खेल मैदान, बच्चों के लिए स्कूल और मिनी पार्क हेतु जमीन चिन्हांकित हो।

अंतिम विदाई का हक:

शव दफनाने के लिए पर्याप्त मुक्तिधाम भूमि का आवंटन।

आबादी विस्तार:

पिछले 25 वर्षों से लंबित 80 परिवारों के लिए आबादी भूमि का आवंटन।

रास्ते का अवरोध:

निस्तारी तालाब और जिला मुख्यालय जाने वाले मुख्य मार्ग को उद्योग क्षेत्र के नक्शे से बाहर किया जाए।

क्या 'फूड पार्क' की नींव में दबेगा ग्रामीणों का भविष्य?

ग्रामीणों का कहना है कि वे उद्योग विरोधी नहीं हैं, लेकिन उन्हें उजाड़कर बनाया गया पार्क मंजूर नहीं है। शासन का आदेश बताकर बलपूर्वक कार्य शुरू करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। निस्तारी तालाब और मुख्य मार्ग जैसे संसाधनों को उद्योगों के बीच घेरना ग्रामीणों के दैनिक जीवन को पंगु बना देगा।


भालूझुलन का यह 'अधिकार युद्ध' अब निर्णायक मोड़ पर है। यदि रायपुर कमिश्नर और जिला प्रशासन ने समय रहते संवेदनशीलता नहीं दिखाई, तो यह शांत विरोध एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है। न्याय की उम्मीद में धूप में जलते ये ग्रामीण आज भी व्यवस्था से सवाल पूछ रहे हैं— "साहब, हमारा गुनाह क्या है?"

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