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मगरलोड में 'साहब' नहीं, 'सारथी' बनकर पहुंचे कलेक्टर: ब्लैकबोर्ड पर लिखा 'जीत का शास्त्र', शिक्षकों को दिया 'मिशन मेरिट' का अल्टीमेटम!

धमतरी/मगरलोड। सरकारी स्कूलों में 'निरीक्षण' शब्द सुनते ही अक्सर हड़कंप मच जाता है। रजिस्टर दुरुस्त होने लगते हैं और माहौल में एक अजीब सा डर तैरने लगता है। लेकिन आज धमतरी के मगरलोड विकासखंड में जो हुआ, उसने इस पुरानी धारणा को तोड़कर रख दिया। यहाँ जिले के कलेक्टर श्री अविनाश मिश्रा जब पहुंचे, तो उनके हाथ में लाल पेन नहीं, बल्कि छात्रों का भविष्य संवारने वाला 'रोडमैप' था। वे एक प्रशासक की कुर्सी छोड़कर, एक 'मेंटर' की भूमिका में नजर आए और क्लासरूम का माहौल किसी मोटिवेशनल सेमिनार जैसा हो गया।

ब्लैकबोर्ड पर उकेरा 'भविष्य का नक्शा'

कक्षा 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं नजदीक हैं और छात्रों के माथे पर तनाव की लकीरें आम बात हैं। कलेक्टर ने इसी नब्ज को पकड़ा। उन्होंने छात्रों से किताबी बातें करने के बजाय जिंदगी का फलसफा साझा किया। उन्होंने साफ कहा कि "सफलता किसी जादू की छड़ी से नहीं, बल्कि सही रणनीति से मिलती है।"

​छात्रों के साथ सीधे संवाद में उन्होंने 'सक्सेस के 4 पिलर्स' (सफलता के 4 स्तंभ) स्थापित किए:

कछुए की चाल (Consistency): उन्होंने समझाया कि खरगोश की तरह तेज दौड़कर थक जाने से बेहतर है कछुए की तरह निरंतर चलते रहना। नियमित अध्ययन ही वह चाबी है जो सिलेबस के पहाड़ को छोटा कर देती है।

वक्त की लगाम (Time Management): जो समय को साधना सीख गया, दुनिया उसकी मुट्ठी में है। उन्होंने छात्रों को टाइम-टेबल के हिसाब से नहीं, बल्कि 'टारगेट' के हिसाब से पढ़ने का मंत्र दिया।

फौलादी आत्मविश्वास (Self-Confidence): कलेक्टर ने कहा, "अगर आप खुद ही अपनी जीत पर भरोसा नहीं करेंगे, तो दुनिया कैसे करेगी?" आत्म-संदेह को डस्टबिन में डालिए और खुद पर भरोसा कीजिए।

पॉजिटिव एटीट्यूड (Positive Mindset): 'मुश्किल है' कहने के बजाय 'मैं कर लूँगा' कहना सीखिए।

टीचर्स रूम में 'मैराथन मंथन': सिर्फ पास नहीं, 'टॉप' चाहिए

छात्रों को जोश भरने के बाद, कलेक्टर का रुख शिक्षकों की ओर हुआ। यहाँ उनका अंदाज एक सख्त प्रशासक का था जो नतीजों पर कोई समझौता नहीं चाहता। बंद कमरे में हुई बैठक में उन्होंने 'मिशन मेरिट' का खाका खींचा:

रिवीजन नहीं, 'स्मार्ट रिवीजन': कोर्स पूरा करना काफी नहीं है। उन्होंने निर्देश दिया कि रिवीजन ऐसा हो जो छात्रों के दिमाग में कॉन्सेप्ट को छाप दे।

एलुमिनी मीट (Alumni Meet - एक नई पहल): कलेक्टर ने एक बेहद नायाब सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि स्कूल के उन पुराने छात्रों को बुलाया जाए जो आज सफल हैं। जब वर्तमान छात्र अपने ही स्कूल के सीनियर को सफल होते देखेंगे, तो उन्हें असली प्रेरणा मिलेगी।

कमजोर कड़ियों पर वार: सतत मूल्यांकन के जरिए उन छात्रों को चिन्हित करने को कहा गया जो पिछड़ रहे हैं, ताकि परीक्षा से पहले उन्हें मुख्यधारा में लाया जा सके।

Breaking Now का नज़रिया (Editor's Take) ​अक्सर हम देखते हैं कि बड़े अधिकारी आते हैं, कमियां निकालते हैं और चले जाते हैं। लेकिन कलेक्टर अविनाश मिश्रा का यह दौरा 'कमियां गिनाने' वाला नहीं, बल्कि 'रास्ता दिखाने' वाला था। मगरलोड के इन सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए, एक आईएएस अधिकारी का उनके बीच खड़े होकर बात करना ही किसी सपने के सच होने जैसा है। यह तस्वीर बताती है कि अगर प्रशासन चाहे, तो शिक्षा की नीरस व्यवस्था में भी नई जान फूँक सकता है।


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