मृत्यु के बाद भी रोशन कर गए दो जिंदगियाँ: ग्राम नारी के लखन लाल साहू ने रचा सेवा का इतिहास
- moolchand sinha

- Dec 26, 2025
- 2 min read

धमतरी (छत्तीसगढ़) |
इंसान दुनिया से चला जाता है, लेकिन उसके कर्म उसे अमर बना देते हैं। छत्तीसगढ़ के ग्राम नारी (कुरुद) के रहने वाले 79 वर्षीय समाजसेवी स्व. लखन लाल साहू ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। उन्होंने अपनी मृत्यु के बाद नेत्रदान कर न केवल दो नेत्रहीनों की जिंदगी में उजाला भरा है, बल्कि पूरे समाज को मानवता का एक ऐसा पाठ पढ़ाया है जो युगों तक याद रखा जाएगा।
संकल्प जो बना मिसाल
स्व. लखन लाल साहू ने अपने जीवनकाल में ही यह दृढ़ संकल्प लिया था कि उनके जाने के बाद उनकी आँखें किसी के काम आ सकें। उनके निधन के बाद, शोक की इस कठिन घड़ी में भी उनके परिजनों ने उनके संकल्प को सर्वोपरि रखा। परिवार की सहमति से चिकित्सकों की टीम बुलाई गई और मरणोपरांत नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी की गई।
पूरा परिवार बना प्रेरणा का पुंज
अक्सर देखा जाता है कि परिवार ऐसे फैसलों में हिचकिचाते हैं, लेकिन साहू परिवार ने 'सेवा' को अपनी विरासत मान लिया है।
धर्मपत्नी का साहस: स्व. लखन लाल की 72 वर्षीय धर्मपत्नी केजिन बाई साहू ने भी तत्काल नेत्रदान की घोषणा कर समाज को झकझोर दिया है।
नई पीढ़ी का संकल्प: परिवार के अन्य सदस्य नरेंद्र साहू और सरस्वती साहू ने भी नेत्रदान का संकल्प लेकर इस मशाल को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है।
"मृत्यु अंत नहीं, नई शुरुआत है"
इलाके के ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि लखन लाल जी ने सिद्ध कर दिया है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि किसी के जीवन का उजाला बनने का माध्यम हो सकती है। उनके इस कार्य से अब दो व्यक्तियों को यह खूबसूरत दुनिया देखने का सौभाग्य मिलेगा।
क्यों जरूरी है नेत्रदान?
भारत में लाखों लोग कॉर्नियल ब्लाइंडनेस के कारण देख नहीं पाते। आपका एक छोटा सा संकल्प किसी के जीवन से सदा के लिए अंधेरा मिटा सकता है। लखन लाल साहू जी का जीवन और उनकी अंतिम विदाई हमें सिखाती है कि हम जाते-जाते भी इस दुनिया को कुछ देकर जा सकते हैं।
श्रद्धांजलि: मानवता के इस सिपाही को कोटि-कोटि नमन, जिन्होंने अपनी आँखों से किसी और की दुनिया रोशन कर दी।








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