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​सड़क पर लावारिस पड़े थे 12 हजार... उठाने को कोई भी उठा लेता! लेकिन इस पुलिसवाले ने जो किया, उसने पूरे शहर का कद बढ़ा दिया

धमतरी।

​"कहते हैं, मुफ्त का पैसा और सड़क पर पड़ी दौलत अच्छे-अच्छों का ईमान डिगा देती है। आज के दौर में जब लोग 100 रुपये के लिए नैतिकता बेच देते हैं, वहां धमतरी की सड़क पर एक ऐसी घटना घटी जिसने साबित कर दिया कि वर्दी का रंग सिर्फ खाकी नहीं, 'सोने' जैसा खरा भी होता है। यह कहानी एक पर्स की नहीं, उस 'जिंदा जमीर' की है जिसे हम अक्सर मरा हुआ मान लेते हैं।"

 किस्सा फ़िल्मी नहीं, हकीकत है। रिसाईपारा के हरीश कुमार आहूजा के लिए वह एक बुरा सपना हो सकता था। पॉपुलर बेकरी के पास उनकी जेब से पर्स गिरा और 12,200 रुपये सड़क पर बिखर गए। भीड़भाड़, शोर और भागमभाग के बीच हरीश को भनक तक नहीं लगी।

​जरा सोचिए, वह नोट किसी की भी जेब गर्म कर सकते थे। लेकिन, किस्मत देखिये—नजर पड़ी सिटी कोतवाली के पेट्रोलिंग प्रभारी सुरेंद्र डंडसेना की।

​ड्यूटी खत्म कर घर लौट रहे डंडसेना के पास दो विकल्प थे—नजर फेर लेना या उसे अपना लेना। लेकिन उन्होंने वह चुना जो एक सच्चा सिपाही चुनता है। उन्होंने सड़क पर बिखरी उस 'पराई अमानत' को समेटा, उसमें मिले दस्तावेजों से मालिक को ढूंढा और एक-एक पैसा गिनकर हरीश कुमार के हाथ में रख दिया।

​जब हरीश के हाथ में उनके खोये हुए 12,200 रुपये वापस आए, तो उनकी आँखों में सिर्फ राहत नहीं, पुलिस के लिए एक अटूट सम्मान था। उन्होंने कहा, "पैसा तो शायद दोबारा कमा लेता, लेकिन इंसानियत पर जो भरोसा आज मिला है, वो अनमोल है।"

Breaking Now का नजरिया (समाज को आईना):

​हम अक्सर पुलिस की आलोचना में सबसे आगे रहते हैं। उनकी एक गलती पर सोशल मीडिया रंग देते हैं। लेकिन आज 'Breaking Now' आपसे पूछता है—अगर वो पर्स आपको मिला होता, तो क्या आप भी सुरेंद्र डंडसेना बन पाते?

​धमतरी पुलिस के इस जवान ने न सिर्फ पैसे लौटाए, बल्कि लालची समाज को ईमानदारी का एक ऐसा पाठ पढ़ाया है जो किसी स्कूल में नहीं मिलता। ईमानदारी अभी जिंदा है, बस उसे निभाने वाला जिगर चाहिए।

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