Collector Abinash Mishra Dhamtari: अकलाडोंगरी के 'कालापानी' में न्याय की दस्तक, लिंक कोर्ट शुरू
- moolchand sinha

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[विशेष रिपोर्ट: विजय दीप, धमतरी छत्तीसगढ़ ]
इतिहास गवाह है कि दूरस्थ अंचलों की आवाज़ अक्सर राजधानी और जिला मुख्यालयों के शोर में दब जाती है। लेकिन धमतरी जिले के नक्शे पर 'कालापानी' के नाम से अपनी पहचान बना चुके अकलाडोंगरी की तक़दीर अब बदलने वाली है। 3 अप्रैल की वह तारीख धमतरी के प्रशासनिक इतिहास में एक 'क्रांति' के रूप में दर्ज हो गई, जब कलेक्टर श्री अबिनाश मिश्रा ने एक ऐसी अभूतपूर्व पहल की, जो न केवल प्रशासनिक संवेदनशीलता का प्रमाण है, बल्कि लोकतंत्र के उस वादे को पूरा करती है जिसमें न्याय सबके लिए सुलभ होना चाहिए।
"धमतरी के प्रशासनिक इतिहास में Collector Abinash Mishra Dhamtari ने एक बड़ा फैसला लिया है..."
गंगरेल बांध के डूब क्षेत्र और दुर्गम रास्तों के कारण अकलाडोंगरी के ग्रामीणों के लिए जिला मुख्यालय की यात्रा किसी तपस्या से कम नहीं थी। दशकों से यह क्षेत्र प्रशासनिक उपेक्षा और भौगोलिक दूरी का दंश झेल रहा था। Collector Abinash Mishra Dhamtari ने इस 'दूरी' के मनोविज्ञान को समझा और 3 अप्रैल को यह ऐतिहासिक निर्णय लिया कि "अगर ग्रामीण दफ्तर तक नहीं आ सकते, तो दफ्तर ग्रामीणों तक जाएगा।"
लिंक कोर्ट: न्याय की नई परिभाषा
अब अकलाडोंगरी की गलियों में तहसीलदार और नायब तहसीलदार की उपस्थिति केवल एक सरकारी दौरा नहीं, बल्कि 'न्याय का सीधा प्रसारण' होगी। कलेक्टर की इस पहल से व्यवस्था में बड़े बदलाव आएँगे:
त्वरित समाधान: ज़मीन विवाद, सीमांकन और नामांतरण जैसे राजस्व मामले अब तारीखों के जाल में नहीं फंसेंगे।
संसाधनों की बचत: ग्रामीणों के पसीने की कमाई अब बस भाड़े और वकीलों की फीस में नहीं, बल्कि उनके घर की खुशहाली में खर्च होगी।
पारदर्शिता का युग: बंद कमरों के बजाय गांव की चौपाल पर होने वाली सुनवाई से भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और जनता का विश्वास बहाल होगा।
वंचितों के मसीहा बनकर उभरे कलेक्टर अबिनाश मिश्रा
यह पहल केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि एक विज़न है। कलेक्टर मिश्रा ने यह साबित कर दिया कि उनकी पैनी दृष्टि जिले के उस अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति पर भी है, जो सरकारी योजनाओं की कतार में सबसे पीछे खड़ा है।
"प्रशासनिक फाइलों में जो क्षेत्र 'कालापानी' कहलाता था, अब वह सुशासन की नई मिसाल बनेगा। यह लिंक कोर्ट केवल कागजों का निराकरण नहीं, बल्कि एक क्षेत्र के पिछड़ेपन के दाग को धोने की कोशिश है।"
जनता का फैसला: अब होगा वास्तविक स्वराज
अकलाडोंगरी के ग्रामीणों के लिए 3 अप्रैल का यह फैसला किसी दिवाली से कम नहीं है। सालों से जिन फाइलों पर धूल जमी थी, अब उन पर 'मौके पर निराकरण' की मुहर लगेगी। यह एक नए युग का सूत्रपात है, जहाँ एक संवेदनशील कलेक्टर ने ग्रामीणों की सदियों पुरानी पीड़ा को न केवल पहचाना, बल्कि उसका समाधान भी उनके घर तक पहुँचा दिया।
धमतरी के इतिहास में अब अकलाडोंगरी के लोगों के लिए जिला मुख्यालय दूर नहीं है, क्योंकि 3 अप्रैल के बाद से धमतरी का न्याय तंत्र खुद चलकर अकलाडोंगरी आ गया है।




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