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देहदान और नेत्रदान: भखारा के गुरुजी ने जाते-जाते शिक्षा और मानवता को दी नई रोशनी

1 day ago
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देह ही नहीं, सोच भी दान की •

भखारा/धमतरी।

जीवनभर विद्यार्थियों को ज्ञान की रोशनी देने वाले ग्राम कोलियरी निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक स्व. देवराम सोन ने अपने निधन के बाद भी समाज के लिए सेवा की मिसाल कायम की। उन्होंने जीवित रहते देहदान और नेत्रदान का संकल्प लिया था। इसी संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने 10 मार्च 2025 को पं. जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय, रायपुर के एनाटॉमी विभाग में स्वैच्छिक देहदान की प्रक्रिया पूरी कर महाविद्यालय से पूर्व स्वीकृति प्राप्त कर ली थी।

उनके निधन के बाद परिजनों ने उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उनका शरीर मेडिकल शिक्षा के लिए महाविद्यालय को सौंप दिया। साथ ही नेत्रदान भी किया गया, जिससे उनकी आंखें किसी जरूरतमंद के लिए दृष्टि का माध्यम बन सकें।

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अंतिम इच्छा में भी शिक्षा और सेवा

स्व. देवराम सोन के पुत्र मनीष सोन ने बताया कि उनके पिता जीवनभर शिक्षा को सबसे महत्वपूर्ण मानते थे। उनकी इच्छा थी कि उनके जाने के बाद भी उनकी देह किसी उपयोगी कार्य में आए और उनकी आंखें किसी जरूरतमंद के जीवन में रोशनी ला सकें।

मनीष भूपेश ने बताया, “पिताजी की इच्छा थी कि उनकी देह मेडिकल छात्रों के प्रशिक्षण में काम आए और उनकी आंखें किसी जरूरतमंद को रोशनी दें। उन्होंने पहले ही आवश्यक दस्तावेज और औपचारिकताएं पूरी कर ली थीं। उनके निधन के बाद हमने उनकी इच्छा के अनुसार देहदान और नेत्रदान कराया।”


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देहदान और नेत्रदान से जुड़ा उनका संकल्प

स्व. देवराम सोन ने देहदान और नेत्रदान का फैसला अपने जीवनकाल में ही कर लिया था। इसके लिए उन्होंने आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर मेडिकल कॉलेज से पूर्व स्वीकृति भी प्राप्त कर ली थी। इस तरह उनका निर्णय केवल अंतिम समय की इच्छा नहीं, बल्कि पहले से लिया गया एक सोचा-समझा सामाजिक संकल्प था।

उनका यह कदम बताता है कि सेवा की भावना केवल जीवन तक सीमित नहीं होती। व्यक्ति अपने जाने के बाद भी अपनी देह मेडिकल शिक्षा और नेत्रदान के माध्यम से समाज के काम आ सकती है।

शिक्षक के रूप में बनाई अलग पहचान

स्व. देवराम सोन ने अपने कार्यकाल में वर्षों तक विद्यार्थियों को शिक्षा दी। ग्रामीणों के अनुसार वे केवल कक्षा तक सीमित शिक्षक नहीं थे, बल्कि सामाजिक जीवन में भी सक्रिय रहते थे।

सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका जुड़ाव सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से बना रहा। वे गायत्री परिवार के कार्यक्रमों, गांव की मानस मंडली में व्याख्यान और कबीर सत्संग जैसे आयोजनों में सक्रिय रूप से शामिल होते थे।

अपने सरल व्यवहार और विचारों के कारण वे ग्रामीणों के बीच सम्मानित रहे। शिक्षा और समाजसेवा से उनका जुड़ाव उनके जीवन की प्रमुख पहचान रहा।


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मेडिकल शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण है स्वैच्छिक देहदान

स्वैच्छिक देहदान मेडिकल शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। दान की गई देह के माध्यम से मेडिकल विद्यार्थी मानव शरीर की संरचना और विभिन्न अंगों का व्यावहारिक अध्ययन करते हैं।

स्व. देवराम सोन का देहदान इसी दृष्टि से शिक्षा के क्षेत्र में योगदान है। वहीं, नेत्रदान किसी जरूरतमंद व्यक्ति के लिए दृष्टि का अवसर पैदा कर सकता है। इस कारण उनका निर्णय शिक्षा और मानव सेवा—दोनों से जुड़ा हुआ है।

गांव के लिए बनी प्रेरणा की मिसाल

स्व. देवराम सोन के देहदान और नेत्रदान की पहल ने ग्रामीण क्षेत्र में भी इस विषय को लेकर जागरूकता बढ़ाई है। परिजनों और परिचितों के अनुसार उन्होंने जीवनभर शिक्षा को महत्व दिया और निधन के बाद भी उनकी सोच ज्ञान और मानव सेवा से जुड़ी रही।

उनका निर्णय समाज को यह संदेश देता है कि देहदान और नेत्रदान के जरिए व्यक्ति अपने जाने के बाद भी समाज के काम आ सकता है। मेडिकल शिक्षा के लिए देहदान और जरूरतमंद के लिए नेत्रदान के माध्यम से स्व. देवराम सोन ने अपनी अंतिम इच्छा को मानव सेवा से जोड़ दिया।

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