कुरुद रुद्राभिषेक स्वागत — खर्च किसी और के खाते से, तालियां किसी और की झोली में!
- moolchand sinha

- 13 hours ago
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ढोल थमे, फूल बिखरे, नारे गूंजे... और फिर शुरू हुई वो चर्चा, जो कुरुद रुद्राभिषेक स्वागत को स्वागत से कहीं ज्यादा दिलचस्प कहानी बना गई!

कुरुद ।
राजनीति में एक पुरानी कहावत है—"पसीना कोई और बहाता है, संसाधन कोई और झोंकता है और अंत में सुर्खियाँ किसी और की झोली में जा गिरती हैं।" कुरुद रुद्राभिषेक स्वागत के दौरान घटा हालिया घटनाक्रम इसी कहावत का जीवंत उदाहरण बन गया है। पूर्व मुख्यमंत्री के कोटेश्वर महादेव रुद्राभिषेक प्रवास के दौरान भारत माला रोड पर हुआ यह स्वागत समारोह अब एक ऐसे मोड़ पर आ चुका है, जहाँ भव्यता से ज्यादा उसकी भीतरी कानाफूसी सुर्खियाँ बटोर रही है।
कुरुद रुद्राभिषेक स्वागत में तस्वीर में कोई और, चर्चा में कोई और
एक धार्मिक अनुष्ठान के बहाने भारत माला रोड पर उतरी भारी भीड़ ने न केवल ट्रैफिक का मिजाज बदला, बल्कि इलाके के सियासी समीकरणों की नई पटकथा भी लिख दी। आतिशबाजी के धमाकों, ढोल-नगाड़ों की थाप और गगनभेदी नारों के बीच देखने में यह एक सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार लगा—मगर असल कहानी तो कुछ और ही रची जा रही थी, दिखावे से कहीं परे। जैसे ही पूर्व मुख्यमंत्री का काफिला आगे बढ़ा और धुएं का गुबार छंटा, कुरुद के चौक-चौराहों पर एक ही सवाल गूंजने लगा कि इतनी बड़ी तैयारी के पीछे असली दिमाग और असली पसीना किसका था?
कुरुद रुद्राभिषेक स्वागत में श्रमिकों की हुंकार या सोची-समझी शक्ति-प्रदर्शन?
इस स्वागत समारोह का सबसे दिलचस्प पहलू हमाल और रेजा संघ की अप्रत्याशित और व्यापक मौजूदगी रही। आमतौर पर राजनीति की चौखट से दूर रहने वाला यह तबका जब कतारबद्ध होकर सड़क पर उतरा, तो कुरुद की सियासी गलियों में हलचल तेज़ हो गई। जिन हाथों में दिनभर बोझ उठाने का हथौड़ा और टोकरी होती है, उन हाथों की सहभागिता ने आयोजन को पंख तो लगा दिए, लेकिन साथ ही यह सवाल भी छोड़ दिया कि यह स्वस्फूर्त निष्ठा थी या फिर कुरुद के सियासी मंच पर वर्चस्व की नई जंग का आगाज़?
कुरुद रुद्राभिषेक स्वागत की श्रेय जंग: हवा में तैरता एक अनुत्तरित सवाल
यदि यह स्वागत महज एक औपचारिकता होता, तो शायद इतनी चर्चा न होती। लेकिन जिस तरह संगठनात्मक ताकत और कार्यकर्ताओं का हुजूम भारत माला रोड पर उमड़ा, उसने इसे एक सोची-समझी सियासी नुमाइश का रूप दे दिया। आतिशबाजी शांत हो चुकी है, फूलों की पंखुड़ियां सड़कों से बुहार दी गई हैं और ढोल की थाप भी थम चुकी है—लेकिन हवा में एक तीखा सवाल अब भी अटका हुआ है: "खर्च जिसने किया, वाहवाही उसे मिलेगी या नहीं? या फिर यह भी उन किस्सों में शुमार होगा, जहां मेहनतकश गुमनामी में रह जाते हैं और तालियों की माला कोई और पहन ले जाता है?"
फिलहाल जवाब किसी के पास नहीं है, मगर कुरुद रुद्राभिषेक स्वागत के इस एक दिन के घटनाक्रम ने कई रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है और आने वाले दिनों के लिए बड़े सियासी संकेत दे दिए हैं।




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