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सियासी 'गम्मत': गातापार में लोक कला के बहाने बघेल ने बजाई रणभेरी, साय सरकार से पूछा- "काहे की डबल इंजन?"

कुरुद (धमतरी) | रविवार को कुरुद ब्लॉक के ग्राम गातापार (कोर्रा) में एक दिलचस्प नजारा देखने को मिला। मौका था तीन दिवसीय लोक कला महोत्सव के समापन का, जहाँ फिजाओं में नाचा, गम्मत और जसगीत की गूंज होनी थी। लेकिन, जैसे ही पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल मंच पर पहुंचे, यह सांस्कृतिक उत्सव एक सियासी महासंग्राम में तब्दील हो गया। अब चर्चा यह नहीं हो रही कि मंच पर किस कलाकार ने कैसा नृत्य किया, बल्कि चर्चा इस बात की है कि क्या यह 'लोक कला महोत्सव' था या 2028 के चुनाव के लिए कांग्रेस का 'राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन'।

सांस्कृतिक शाम और सियासी संग्राम: आखिर मंशा क्या थी?

​महोत्सव के समापन पर भूपेश बघेल ने जिस आक्रामकता के साथ अपनी बात रखी, उससे साफ हो गया कि कांग्रेस अब सांस्कृतिक मंचों का उपयोग जनता से जुड़ने के लिए 'हथियार' के तौर पर कर रही है। बघेल के भाषण ने कला प्रेमियों के बीच बैठे किसानों और ग्रामीणों को सीधा संदेश दिया।

"काहे की डबल इंजन?" - खाद की किल्लत पर तीखा प्रहार

बघेल ने लोक परंपराओं की बात करते-करते सीधे 'डबल इंजन' सरकार की दुखती रग पर हाथ रख दिया। उन्होंने कहा, "जो सरकार किसान को एक बोरी डीएपी और यूरिया नहीं दे सकती, उसे खुद को डबल इंजन कहने का हक नहीं है।" उन्होंने आरोप लगाया कि ₹1300 की डीएपी ₹2000 में बिक रही है और साय सरकार मूकदर्शक बनी हुई है।

उत्सव के बहाने धान खरीदी पर घेराबंदी

पूर्व सीएम ने कहा कि आज किसान सोसायटियों में टोकन और भुगतान के लिए भटक रहा है। "सांय-सांय" शब्द पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि सिस्टम ऐसा बनाया गया है कि बिचौलियों के काम तेजी से हो रहे हैं और मेहनतकश किसान मुंह ताक रहा है। डेढ़ लाख किसानों का रकबा घटाना सरकार की एक बड़ी साजिश है।

संस्कृति की रक्षा या सत्ता की वापसी?

बघेल ने भावनात्मक कार्ड खेलते हुए कहा कि उनकी सरकार ने छत्तीसगढ़िया संस्कृति को मान दिया, त्यौहारों पर छुट्टियां दीं। उन्होंने वर्तमान सरकार पर हमला करते हुए कहा कि भाजपा की नजर छत्तीसगढ़ के जल, जंगल और जमीन पर है। हसदेव की कटाई को उन्होंने पुरखों की विरासत पर हमला बताया।

हुंकार: "बदलाव की तैयारी अभी से"

​कार्यक्रम में मौजूद अन्य वक्ताओं—विधायक ओंकार साहू, अम्बिका मरकाम और पूर्व विधायक लेखराम साहू—ने भी बिजली बिल और कुप्रबंधन के बहाने सरकार को कोसा। महोत्सव के अंतिम दिन उमड़ी भीड़ ने यह संकेत दे दिया कि आने वाले तीन सालों में लड़ाई 'सड़क से सदन' तक और भी तेज होने वाली है।

​ गातापार का यह आयोजन एक बड़ा सवाल छोड़ गया—क्या यह केवल लोक कला का सम्मान था? जिस तरह से मंच से खाद, धान, रकबा और हसदेव की बात हुई, उससे साफ है कि भूपेश बघेल ने इस महोत्सव के जरिए कुरुद की धरती से 2028 के विधानसभा चुनाव का बिगुल फूंक दिया है।

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